शतरंज की खामोशी पर खतरा: भारत में बढ़ती लोकप्रियता के बीच ‘फैंस’ और ‘खिलाड़ियों’ के बीच टकराव

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शतरंज, जो दशकों से बौद्धिक खेल की पराकाष्ठा माना जाता रहा है, आज एक बड़े चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ इसकी सदियों पुरानी परंपरा है—वह पवित्र खामोशी जो एकाग्रता की माँग करती है। दूसरी तरफ, इसकी नई वैश्विक लोकप्रियता को भुनाने और इसे भविष्य के लिए तैयार करने का व्यावसायिक दबाव है। यह विशेष रूप से भारत जैसे सबसे अधिक आबादी वाले देश में महत्वपूर्ण है, जहाँ शतरंज की दीवानगी आसमान छू रही है। यह संतुलन की एक नाजुक डोर है; एक गलत कदम इस खेल की पहचान को हमेशा के लिए बदल सकता है।

खामोशी की कीमत: वह खेल जिसे कोई नहीं समझता

जब एक प्रशंसक चेन्नई ग्रैंड मास्टर्स या FIDE विश्व कप जैसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में टिकट खरीदकर खेलने के हॉल में प्रवेश करता है, तो उसे अपनी खुशी व्यक्त करने का कोई साधन नहीं मिलता। नियम स्पष्ट हैं: कोई निजी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण नहीं। दर्शक केवल चालों की सूची वाली एक स्क्रीन देख सकता है, जिसमें इवैल्यूएशन इंजन (कंप्यूटर एनालिसिस बार) गायब होता है।

शतरंज के दिग्गज सागर शाह का कहना है कि खेल इतने जटिल होते जा रहे हैं कि अब उन्हें समझना इंटरनेशनल मास्टर्स के लिए भी मुश्किल हो गया है। ऐसे में एक सामान्य प्रशंसक की क्या स्थिति होगी? दर्शक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को देखने के लिए पैसे खर्च कर रहा है, लेकिन वह न तो अपनी टीम का समर्थन कर सकता है और न ही खेल की बारीकियों को विशेषज्ञों की कमेंट्री के माध्यम से समझ सकता है। पारंपरिक रूप में, शतरंज की खामोशी ही किसी भी खेल आयोजन के माहौल की पूर्ण विरोधी है।

शोर के प्रयोग: जब राजा को भीड़ में उछाला गया

कोरोना महामारी के बाद से शतरंज की स्ट्रीमिंग लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, लेकिन खेल को स्टेडियम में दर्शकों की भी ज़रूरत है। इस चुनौती का सामना करने के लिए कुछ आयोजकों ने कट्टरपंथी प्रयोग किए।

लास वेगास फ्रीस्टाइल टूर्नामेंट और eSports वर्ल्ड कप ने माहौल को पूरी तरह बदल दिया। एरीना में प्रशंसकों को लाइव कमेंट्री और इवैल्यूएशन बार तक पहुँच प्रदान की गई, जबकि खिलाड़ियों को भारी नॉइज़ कैंसलेशन हेडफ़ोन पहनने पड़े। इसका उद्देश्य था खिलाड़ियों को विचलित किए बिना प्रशंसकों को मनोरंजन देना।

मगर खिलाड़ियों ने इस बदलाव को सर्वसम्मति से स्वीकार नहीं किया। फैबियानो कारूआना ने इसे पूरी तरह नापसंद किया, अर्जुन एरिगैसी हेडफ़ोन पहनने से नाराज़ थे, और डच ग्रैंडमास्टर अनीश गिरी ने इसे “परेशानी” बताया और eSports वर्ल्ड कप के प्रारूप को “हास्यास्पद” करार दिया।

भारत बनाम यूएसए: जब खेल बना WWE

पिछले महीने टेक्सास में हुए भारत बनाम यूएसए प्रदर्शनी मैच में तो स्थिति और भी अजीब हो गई। इस मुकाबले में खिलाड़ियों ने हेडफ़ोन नहीं पहने थे, और भीड़ को शोर मचाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। विजेता खिलाड़ी को प्रशंसकों के साथ जुड़ने के लिए उकसाया गया।

उदाहरण के लिए, हिकारू नाकामुरा ने विश्व चैंपियन डी गुकेश को हराने के बाद उनके `राजा` (King piece) को भीड़ में उछाल दिया। सागर शाह ने बताया कि आयोजकों ने खिलाड़ियों को जीतने पर अपने प्रतिद्वंद्वी के राजा को तोड़ने तक का सुझाव दिया था—बस इसलिए ताकि भीड़ और अधिक उत्साहित हो जाए।

शतरंज की मूल भावना और नैतिकता को कितना दूर किया जा सकता है? शाह और गुकेश दोनों ने विरोधियों के राजा को तोड़ने के विचार को सिरे से खारिज कर दिया, क्योंकि भारतीय संस्कृति में शतरंज के मोहरों को पवित्र माना जाता है। मनोरंजन की चाह में, क्या हम खेल की गरिमा को नष्ट कर रहे हैं?

अनीश गिरी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि मनोरंजन के लिए डिज़ाइन किए गए तेज टाइम कंट्रोल के कारण खेल ही “हास्यास्पद” लग रहा था। उन्होंने चेतावनी दी: `अगर हर टूर्नामेंट ऐसा ही हो गया, तो शतरंज की दुनिया उस दिशा में चली जाएगी जो मुझे पसंद नहीं है।`

आगे की राह: ग्लोबल चेस लीग का मध्य मार्ग

जर्मन ग्रैंडमास्टर विन्सेंट केमर ने तर्क दिया कि इन सभी प्रयोगों के बावजूद, आयोजकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक `खिलाड़ी का आराम` (Player Comfort) होना चाहिए। उच्च स्तरीय शतरंज के बिना, आप उस उत्पाद को कमजोर कर देंगे जिसे आप जनता को बेचना चाहते हैं।

यह महत्वपूर्ण संवाद ही ग्लोबल चेस लीग (GCL) को प्रशंसक अनुभव में नवाचार की ओर ले जा रहा है। GCL के सीईओ गौरव रक्षित ने बताया कि मुंबई में आयोजित होने वाला लीग का तीसरा सीज़न एक `फेस्टिवल` जैसा होगा।

GCL एक ऐसा समाधान तलाश रहा है जो खामोशी को भंग किए बिना मनोरंजन प्रदान करे: **खेलने के हॉल में बैठे प्रशंसक खुद हेडफ़ोन पहनेंगे, जिसके माध्यम से उन्हें लाइव कमेंट्री मिलेगी, और हॉल की स्क्रीन पर इवैल्यूएशन इंजन भी दिखाया जाएगा।** रक्षित का तर्क है कि जब तक सामान्य प्रशंसक यह नहीं समझेगा कि वह क्या देख रहा है, वह वापस नहीं आएगा।

निष्कर्ष: एक अस्थायी खामोशी

चेन्नई और विश्व कप के टिकट बिक्री के आंकड़े बताते हैं कि पारंपरिक रूप में भी शतरंज भारत में बड़ी भीड़ खींच रहा है। लेकिन आयोजक जानते हैं कि वे निष्क्रिय नहीं रह सकते। लास वेगास, टेक्सास और रियाद जैसे शोरगुल वाले प्रारूप भविष्य में बढ़ते रहेंगे, लेकिन उन्हें सार्वभौमिक स्वीकृति मिलने में लंबा समय लगेगा।

फिलहाल, प्रशंसक की समझ, लाइव जुड़ाव और खिलाड़ी की एकाग्रता के बीच संतुलन एक जटिल पहेली बनी हुई है। जब तक ये प्रयोग जारी रहेंगे, भयावह रूप से शांत प्लेइंग हॉल ही मानक बने रहेंगे। हालांकि, अगर GCL का हेडफ़ोन वाला प्रयोग सफल होता है, तो यह शतरंज को एक सफल दर्शक खेल बनाने की दिशा में एक तेज़ कदम साबित हो सकता है—जहाँ खामोशी बरकरार रहे, लेकिन समझ बढ़ जाए।