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‘ICC बकवास करती है…,’ सिर्फ भारत-पाकिस्तान मैच को रिजर्व डे देने पर बवाल

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Arjun Ranatunga Slams ICC

एशिया कप 2023 में भारत और पाकिस्तान के बीच खेले गए सुपर 4 के मुकाबले को रिजर्व डे देने पर बवाल थमा नहीं है। आपको बता दें कि सुपर 4 के अन्य किसी भी मुकाबले को रिजर्व डे नहीं दिया गया था। जबकि लगातार कोलंबो में बारिश का फोरकास्ट था। इसको लेकर मैच से पहले बांग्लादेश और श्रीलंका के कोच ने सवाल उठाए थे। हालांकि, बाद में बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड की तरफ से इस पर किसी भी आपत्ति को नकारा गया था। अब इसको लेकर एक पूर्व दिग्गज ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आईसीसी को जमकर लताड़ा भी।

ICC सिर्फ बकवास करती है…

श्रीलंका के पूर्व कप्तान अर्जुन राणातुंगा ने इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल, ICC को आड़े हाथों लेते हुए भारत-पाकिस्तान मैच को रिजर्व डे देने के मुद्दे पर लताड़ लगाई। राणातुंगा ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि, आप एशिया कप लें। टूर्नामेंट से पहले आपके पास नियम हैं, लेकिन भारत बनाम पाकिस्तान मैच से पहले, उन्होंने नियम बदल दिए। एशियन क्रिकेट काउंसिल कहां है? आईसीसी कहां है? मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर वे वर्ल्ड कप में भी भारत-पाकिस्तान मैच से पहले नियम बदल दें। आईसीसी अपना मुंह बंद रखेगी और कहेगी ‘ठीक है, ऐसा करो’। आईसीसी सिर्फ बकवास करती है, उसके बस में कुछ नहीं है।

खेल खतरे में पड़ जाएगा…

आपको बता दें कि एशिया कप में किसी भी मैच के लिए रिजर्व डे नहीं था, लेकिन भारत और पाकिस्तान के मैच के लिए नियम बदला गया। इस मैच का नतीजा भी रिजर्व डे पर निकला था। सिर्फ एक मैच के लिए रिजर्व डे रखने के फैसले पर काफी प्रतिक्रियाएं आई थीं। इसी को लेकर राणातुंगा ने आगे कहा कि, किसी टूर्नामेंट के नियमों को एक या दो टीमों के अनुसार बदलने से खेल खतरे में पड़ जाएगा। उन्होंने इस मुद्दे पर चुप्पी साधने के लिए आईसीसी और एसीसी की आलोचना की। 

वह बोले कि, जब आपके पास कोई टूर्नामेंट होता है, जहां आप एक टीम के लिए नियम बदलते हैं तो मैं बहुत सहज नहीं रहता हूं। इससे भविष्य में काफी नुकसान होगा। मुझे आईसीसी और एसीसी के लिए बहुत दुख हो रहा है। क्योंकि आईसीसी के अधिकारी सिर्फ पद पर बने रहना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि, कई पूर्व क्रिकेटर भी इस मुद्दे पर कुछ बोलने से बचते हैं, क्योंकि इससे उनकी कमाई पर असर पड़ेगा।

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लालू के ‘परबल’ का ‘र’ किसके साथ, क्या है बिहार में ठाकुरों के समीकरण पर RJD-BJP की रार और रणनीति?

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Bihar Politics Over Rajput Community: संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल पर राज्यसभा में राजद की ओर से मनोज झा ने चर्चा की थी। इस दौरान कोटे के अंदर कोटा की मांग करते हुए उन्होंने सभी लोगों से अपने अंदर के ठाकुर को मारने का आह्वान किया था। झा ने वंचितों के लिए भागीदारी सुनिश्चित कराने की सभी लोगों से अपील की थी। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में सदन में ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘ठाकुर का कुआं’ की कुछ लाइनें भी पढ़ीं थीं। अब उनके इस कविता पाठ पर बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक सियासी रार छिड़ा है।

लालू यादव की पार्टी राजद के अंदर ही मनोज झा के ठाकुरों पर दिए बयान का विरोध हो रहा है। पहले पूर्व सांसद आनंद मोहन के MLA बेटे चेतन आनंद ने बयान दिया। बाद में खुद आनंद मोहन तीखी जुबान के साथ कूद पड़े और कह डाला कि अगर वह सदन में होते तो झा की जुबान खींच लेते। उधर, बीजेपी भी राजद सांसद के बयान पर बिहार में खूब हंगामा कर रही है। बीजेपी नेताओं ने पटना में इनकम टैक्स गोलंबर पर धरना प्रदर्शन दिया और झा के माफी नहीं मांगने पर सड़क से लेकर गली-गली तक विरोध की बात कही।

क्या है लालू का ‘परबल’ और उसका ‘र’

दरअसल, ये सारी कवायदें अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर हो रही हैं। राजपूत समाज अगड़ी जाति के तहत आता है। झा यानी ब्राह्मण भी उसी अगड़ी जाति के समुदाय का हिस्सा है। इनके अलावा राजपूत और कायस्थ जातियां भी अगड़ी जातियों में गिनी जाती हैं, जिसे लालू प्रसाद ने 1990 के दौर में कभी ‘परबल’ कहा था और उसकी भुजिया बनाने को कहा था। लालू ने इसी तरह के नारों से समाज के पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को इनके खिलाफ लामबंद कर 15 वर्षों तक राज किया था। परबल का मतलब- प से पंडित, र से राजपूत, ब से बाभन (भूमिहार) और ल से लाला यानी कायस्थ है। 

इसे कथित तौर पर ‘भूरा बाल’ भी कहा गया था। हालांकि, बाद के कई साक्षात्कारों में लालू यादव ने इस बात का खंडन किया कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि ‘भूरा बाल’ साफ करो। यहां भी भूरा बाल से मतलब- भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला से है। लालू-राबड़ी के 15 वर्षों के शासनकाल और बाद के वर्षों में भी अगड़े समाज की तीन जातियों (ब्राह्मण, भूमिहार और कायस्थों) का बहुत ही कम वोट लालू यादव की पार्टी को मिलता रहा है लेकिन राजपूत वोट बैंक में लालू यादव ने शुरुआत से ही सेंधमारी कर रखी है।

बिहार में राजपूत कितना अहम?

बिहार में राजपूतों की आबादी करीब 6 से 8 फीसदी है। 30 से 35 विधानसभा सीटों में इस जाति की मजबूत पकड़ है। 2020 के विधानसभा चुनाव में राज्य की 243 सीटों में से 64 सीटों पर अगड़ी जाति के उम्मीदवारों की जीत हुई है। इनमें से 28 अकेले राजपूत हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में 20 राजपूत उम्मीदवार विधायक बने थे। बीजेपी ने असेंबली चुनावों से पहले अभिनेता सुशांत सिंह का मुद्दा खूब उठाया था। इसका फायदा भी उसे मिला। बीजेपी के 21 राजपूत उम्मीदवारों में से 15 जीतने में कामयाब रहे, जबकि उसकी सहयोगी रही जेडीयू के सात में से दो राजपूत कैंडिडेट ही जीत सके थे। एनडीए गठबंधन में वीआईपी के टिकट पर भी दो राजपूतों ने जीत दर्ज की थी।

राजद का स्ट्राइक रेट सबसे ज्यादा

तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले गठबंधन ने कुल 18 राजपूतों को टिकट दिया था, जिसमें 8 ही जीतकर विधानसभा पहुंच सके। हालांकि, राजद के आठ राजपूत कैंडिडेट में से सात जीतने में कामयाब रहे और सबसे अधिर स्ट्राइक रेट दर्ज की। कांग्रेस ने 10 को टिकट दिया लेकिन जीते सिर्फ एक। इससे पहले यानी 2015 के चुनावों में बीजेपी के 9, आरजेडी के 2, जेडीयू के 6 और कांग्रेस से तीन राजपूत विधायक जीते थे। 

लोकसभा में भी राजपूतों का चला सिक्का

2019 के लोकसभा चुनावों में भी बिहार में राजपूत उम्मीदवारों का सिक्का चला। सबसे ज्यादा सात सीटों पर इसी बिरादरी के लोगों ने जीत दर्ज की। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। इनमें से 39 सीटों पर बीजेपी-जेडीयू के गठबंधन वाली एनडीए ने जीत दर्ज की थी। 39 में सबसे ज्यादा सात पर राजपूत, 5 पर यादव, 3-3 पर भूमिहार- कुशवाहा, वैश्य, दो पर ब्राह्मण, एक-एक पर कायस्थ और कुर्मी, एससी के 6 और अति पिछड़ा वर्ग के 7 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। एक मात्र मुस्लिम चेहरे ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी।

राजपूतों का झुकाव किस ओर? 

चुनावी समीकरणों और हार-जीत के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि भूमिहार, ब्राह्मण और कायस्थ भाजपा के साथ है, जबकि राजपूत वोट अभी भी एकमुश्त भाजपा की तरफ नहीं है। हालांकि 2019 और 2020 में उनकी लामबंदी का फायदा भाजपा को मिला है लेकिन राजपूत समाज लालू का भी कोर वोट बैंक रहा है। लालू रघुवंश प्रसाद सिंह, जगदानंद सिंह, प्रभुनाथ सिंह और उमाशंकर सिंह जैसे राजपूत नेताओं के सहारे इस वोट बैंक में सेंध लगाते रहे हैं। 2009 के संसदीय चुनाव में राजद के तीन राजपूत उम्मीदवार सांसद बने थे। इनमें वैशाली से रघुवंश सिंह, बक्सर से जगदानंद सिंह और महाराजगंज से उमा शंकर सिंह शामिल थे।

आगे की रणनीति क्या?

राजद इस समुदाय का वोट पाने के लिए इनके नेताओं को तरजीह देती रही है। इसी कड़ी में प्रदेश राजद के अध्यक्ष के रूप में जगदानंद सिंह की नियुक्ति है। इसके अलावा चुनावों से ऐन पहले आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद को राजद में शामिल कराना और उनके बेटे को टिकट देना भी शामिल रहा है। हालांकि, हाल के दिनों में रघुवंश सिंह के विवाद के बाद राजद की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर हुई है, जबकि बीजेपी की स्थिति पहले से और मजबूत हुई है।

बीजेपी ने जिस तरह से सुशांत सिंह के मुद्दे को राजपूत अस्मिता और युवा अभिमान से जोड़कर राजपूत वोट बैंक को लामबंद किया है, उसी तरह से नए विवाद के जरिए भी 2024 के लोकसभा चुनाव में भी राजपूतों पर डोरे डाल रही है और सीधे तौर पर राजद को ही खलनायक बता रही है, जिसके पास बीजेपी के बाद सबसे ज्यादा रोजपूत वोट बैंक का शेयर है।



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भारत का विदेशी कर्ज बढ़कर 629 अरब डॉलर के पार, आरबीआई ने जारी किए जून के आंकड़े

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Photo:PIXABAY डॉलर

देश के ऊपर विदेशी कर्ज (India’s foreign debt) का आकार काफी बड़ा है। भारत का विदेशी कर्ज जून 2023 के आखिर में मामूली रूप से बढ़कर 629.1 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, हालांकि कर्ज-जीडीपी अनुपात में गिरावट आई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से गुरुवार को जारी आंकड़ों में यह बात सामने आई। आंकड़ों में निकलकर सामने आया है कि, कर्ज में 4.7 अरब अमेरिकी डॉलर का इजाफा हुआ है। मार्च के आखिर में यह 624.3 अरब अमेरिकी डॉलर था। 

सरकार का सामान्य बकाया कर्ज घटा


खबर के मुताबिक, आरबीआई (RBI) ने कहा कि जून 2023 के आखिर में विदेशी ऋण (India’s foreign debt) और सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात घटकर 18.6 प्रतिशत हो गया, जो मार्च 2023 के आखिर में 18.8 प्रतिशत था। आरबीआई (RBI) ने कहा कि सरकार का सामान्य बकाया कर्ज कम हुआ, जबकि गैर-सरकारी कर्ज जून 2023 के आखिर में बढ़ गया। इसके अलावा, विदेशी कर्ज में 32.9 प्रतिशत की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी कर्ज की रही। इसके बाद इसमें मुद्रा और जमा, व्यापार ऋण और एडवांस और ऋण प्रतिभूतियों का योगदान रहा। 

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महाभारत और सिया के राम के बाद आएगा चिरंजीवी हनुमान, पढ़ें खबर 

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चिरंजीवी हनुमान का स्टार प्लस में होगा आगाज

नई दिल्ली:

एपिक सागा ने दर्शकों को बांधे रखने का काम किया है. चाहे वह सीरियल सिया के राम हो या महाभारत की गाथा. फैंस को एक अलग एहसास के साथ आइकोनिक गाथा को ऑडियंस के सामने पेश किया गया है. वहीं अब इसी में एक और नाम जुड़ने वाला है, जो है चिरंजीवी हनुमान: राम भक्ति रुद्र शक्ति का. स्टार प्लस अपने दर्शकों को दिलचस्प और मजेदार कंटेंट देने के लिए जाना जाता है. इसमें अपने अत्यधिक आकर्षक शो के जरिए प्यार, ड्रामा, बदला और कई अन्य भावनाओं से लेकर सभी शामिल हैं. अनुपमा जैसी शानदार सीरीज, जो महिला सशक्तिकरण को दर्शाती है. वहीं ये रिश्ता क्या कहलाता है, तेरी मेरी डोरियां, इमली, ये है चाहतें, तितली, बातें कुछ अनकही सी, और कह दूं तुम्हें की कहानी, फैमिली ड्रामा और रोमांस पर फोकस करता है, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा है.

इसी सफर को जारी रखते हुए स्टार प्लस ने एक बार फिर इतिहास में एंट्री की है और अपने दर्शकों के लिए सबसे आइकोनिक गाथा, चिरंजीवी हनुमान: राम भक्ति रुद्र शक्ति लेकर आया है. इस ऐतिहासिक शो की असाधारणता और भव्यता का अनुभव जल्द ही दर्शकों को होगा.

इस एपिक कहानी में शक्तिशाली हनुमान की मदद से सीता को रावण के चंगुल से बचाने की राम की खोज को दर्शाया गया है, और यह शो भगवान हनुमान की यात्रा पर प्रकाश डालेगा. यह एक टाइमलेस ड्रामा है, जो दर्शकों को किरदारों की भव्यता और शो को एक एपिक और ताज़ा नजरिए से याद दिलाने में मदद करेगा. शो चिरंजीवी हनुमान: राम भक्ति रुद्र शक्ति निश्चित रूप से दर्शकों के दिलों में किरदारों की छाप छोड़ेगा, और हम इससे अधिक सहमत नहीं हो सकते हैं.

चिरंजीवी हनुमान: राम भक्ति रुद्र शक्ति स्टार प्लस पर प्रसारित होने के लिए पूरी तरह तैयार है, जिसकी झलक नए वीडियो में देखने को मिली है. 



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