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Heeraben Health Update: हीराबेन की अब कैसी है तबियत, PM मोदी के बड़े भाई ने दिया अपडेट

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मां हीराबेन को कुछ परेशानियां के चलते बुधवार को सुबह ‘यू एन मेहता इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी एंड रिसर्च सेंटर’ में भर्ती कराया गया था। जानें कैसी है उनकी तबियत…



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मां का ख्याल रखने के लिए ऑफिस से छुट्टी ली, गूगल ने नौकरी से ही निकाल दिया

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दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में शामिल गूगल की ओर से असंवेदनशील तरीके से एक कर्मचारी को नौकरी से निकालने का मामला सामने आया है। गूगल में वीडियो प्रोडक्शन मैनेजर के तौर पर काम करने वाले इस कर्मचारी ने कैंसर से जूझ रहीं अपनी मां का ख्याल रखने के लिए लंबी छुट्टी ली थी। पॉल बेकर नाम के इस कर्मचारी ने अपना अनुभव साझा किया है। बता दें, बीते कुछ दिनों में गूगल के सैकड़ों कर्मचारियों की नौकरी गई है। 

पॉल ने बताया कि वह अपनी मां का ख्याल रखने के लिए छुट्टी पर थे । इस दौरान अचानक उनके लैपटॉप का कनेक्शन कट कर दिया गया और जब उन्होंने अपने पर्सनल कंप्यूटर से लॉगिन की कोशिश की तो पता चला कि उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है। ऐसी ढेरों कहानियां हैं, जिनमें पता चला है कि किस तरह गूगल ने अचानक दर्जनों कर्मचारियों की नौकरी छीनकर उनकी जिंदगी पर असर डाला है। इसी तरह हाल ही में मां बनी एक कर्मचारी को भी निकाल दिया गया है। 

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टर्मिनल कैंसर से जूझ रही हैं बेकर की मां 

बेकर ने बताया कि उनकी मां टर्मिनल कैंसर से जूझ रही हैं और और उनका ख्याल रखने के लिए बेकर को करीब एक महीने की छूट लेनी पड़ी। इस छु्ट्टी के दौरान ही उन्हें जानकारी मिली कि कंपनी ने ढेरों कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है। बाद में पता चला कि उनकी नौकरी भी गई है और वे अकेले नहीं हैं। कंपनी ने करीब 12 हजार कर्मचारियों को झटके में नौकरी से निकाल दिया है और कंपनी CEO सुंदर पिचाई ने ईमेल में कर्मचारियों को निकाले जाने की जानकारी दी है। 

लिंक्डइन पर नौकरी जाने की जानकारी दी 

वीडियो प्रोडक्शन मैनेजर के पद पर काम करने वाले बेकर ने लिंक्डइन पर लिखा, “12 हजार गूगल कर्मचारियों की नौकरी जाने के बाद ढेरों कहानियां सामने आ रही हैं। मैं अपनी कहानी साझा करने के लिए तैयार हूं। अपने परिवार के सदस्य के टर्मिनल कैंसर के इलाज के चलते मैं केयरर्स लीव पर था। मैं गूगल का करियर और कल्चर दोनों मिस करूंगा।” बेकर ने बताया कि उन्हें हमेशा से ही गूगल के ओवरस्टाफ्ड होने को लेकर चिंता थी। हालांकि, उन्हें अंदाजा नहीं था कि एकसाथ इतने कर्मचारियों की नौकरी जाएगी। 

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नौकरी छीनने वाली अकेली कंपनी नहीं गूगल

गूगल अकेली कंपनी नहीं है, जिसने अपने कर्मचारियों की नौकरी छीनी है। साल की शुरुआत से ही अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और अन्य टेक कंपनियां इस तरह के फैसले ले रही हैं। ट्विटर ने केवल एक तिहाई स्टाफ बाकी रखते हुए बाकी सभी को नौकरी से निकाल दिया है और बाकी कर्मचारी भी अपनी क्षमता से ज्यादा काम कर रहे हैं।  



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“कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिनका राष्ट्रहित में खुलासा..”: गुप्त रिपोर्ट सार्वजनिक होने पर बोले कानून मंत्री

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इसी के जवाब में कानून मंत्री रिजिजू ने कहा कि पारदर्शिता के मानक अलग हैं. उन्होंने इंडिया टीवी न्यूज चैनल को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिनका राष्ट्रहित में खुलासा नहीं किया जाना चाहिए और कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिन्हें सार्वजनिक हित में छिपाया नहीं जाना चाहिए.” सूत्रों ने एनडीटीवी को बताया था कि जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों के केंद्र सरकार की खींचतान, जिसमें खुफिया एजेंसियों की आपत्तियां भी शामिल हैं. उससे सुरक्षा प्रतिष्ठान में बेचैनी बढ़ गई है. आपत्तियों को सार्वजनिक न करने और उन खुफिया एजेंसियों की गोपनीयता बनाए रखने की प्रथा रही है जो उच्च न्यायपालिका के पदों के लिए संभावित उम्मीदवारों की छानबीन करती हैं.

इस खुलासे ने सरकार के भीतर बड़ी चिंता पैदा कर दी है, जिसे लगता है कि इसका खुलासा नहीं किया जाना चाहिए था और सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए था. कानून मंत्री रिजिजू ने कहा, ‘जब भी मुझे बोलना होगा, मैं कानून मंत्री के रूप में बोलूंगा. हम अपने आदरणीय पीएम की सोच और दिशा-निर्देशों के अनुसार काम करते हैं, लेकिन मैं यहां यह सब नहीं बता सकता.’ उन्होंने आगे कहा कि वह न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर चर्चा नहीं कर सकते क्योंकि यह एक ‘संवेदनशील मुद्दा’ है, लेकिन जोर देकर कहा कि सरकार “सोच समझ कर निर्णय लेती है और एक नीति का पालन करती है.”

उन्होंने कहा, “न तो सरकार की ओर से और न ही न्यायपालिका की ओर से, ऐसे मामलों को सार्वजनिक तौर पर रखा जाना चाहिए. “न्यायपालिका पर हमले के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर, रिजिजू ने कहा कि उन्होंने कभी भी इसके अधिकारों को कम करने या खराब रोशनी में दिखाने की कोशिश नहीं की, लेकिन वो इस मामले पर प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर हुए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने लोगों को “गलत संदेश” भेजा. उन्होंने पूछा कि पीएम मोदी जी के पिछले साढ़े आठ साल के शासन का एक उदाहरण मुझे बताएं, जब हमने न्यायपालिका के अधिकारों को कम करने की कोशिश की या इसे खराब तरीके से दिखाने की कोशिश की?

मैंने न्यायपालिका के बारे में जो कुछ भी कहा है वह केवल प्रतिक्रिया में था. जब सुप्रीम कोर्ट की बेंच से कहा गया कि सरकार फाइलों पर बैठी है, तो लोकतंत्र में मेरे लिए जवाब देना जरूरी हो जाता है. असल में हम फाइलों पर नहीं बैठते हैं, लेकिन हम आवश्यकतानुसार प्रक्रिया का पालन करते हैं. अदालतें उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं कहना चाहिए जिससे लोगों में गलत संदेश जाए.” रिजिजू ने दोहराया कि उन्होंने न्यायपालिका पर कभी हमला नहीं किया, और कहा कि उन्हें “सही तरीके से” कहना था. उन्होंने कहा कि इसे हमले के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए.

हालांकि, रिजिजू ने एक ऐसी रेखा की ओर इशारा किया, जिसे राष्ट्रीय हित में पार नहीं किया जाना चाहिए. “हम सभी न्यायपालिका का सम्मान करते हैं, और अगर भारतीय लोकतंत्र मजबूत है, तो सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारी न्यायिक संरचना मजबूत और मजबूत है. इसलिए हम कहते हैं, हम न्यायपालिका के काम में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और न्यायपालिका को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.” कार्यपालिका और विधायिका के कार्य. बीच में एक ‘लक्ष्मण रेखा’ (विभाजन रेखा) खींची गई है. हमें यह हमारे संविधान से मिली है. यदि कोई पक्ष उस ‘लक्ष्मण रेखा’ को पार नहीं करता है तो यह देश के हित में होगा.

न्यायाधीशों को चुनाव लड़ने या सार्वजनिक जांच का सामना करने की अपनी हालिया टिप्पणी पर, लेकिन वे अपने कार्यों, अपने निर्णयों के माध्यम से जनता की नजर में हैं, उन्होंने कहा कि यह “हजारों” उनसे मिलने और उन्हें यह कहते हुए लिखने के संदर्भ में था. न्यायाधीशों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए.”जवाबदेही होनी चाहिए क्योंकि यह लोकतंत्र है, और लोकतंत्र में राजा नहीं हो सकता. मैं उन्हें बताना चाहता हूं, लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक होती है, और संविधान हमारा पवित्र ग्रंथ है. हम बस शासन करते हैं.”

संविधान के अनुसार इसलिए मैंने कहा कि चूंकि न्यायाधीशों को चुनाव नहीं लड़ना होता है, वे नियुक्त होते हैं, उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका काम अच्छा हो क्योंकि लोग देख रहे हैं.’ सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति में बड़ी भूमिका के लिए दबाव बना रही है, जो कि 1993 से सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम या वरिष्ठतम न्यायाधीशों के पैनल का डोमेन रहा है. यह मुद्दा शीर्ष अदालत द्वारा पीछे धकेलने और यहां तक कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के पीछे धकेलने के कारण बढ़ गया है.

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‘कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले को पद्मविभूषण दिया, और…’, संजय राऊत का बड़ा बयान

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शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) सांसद संजय राऊत।

मुंबई: शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता संजय राऊत ने स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर और शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे को भारत रत्न न दिए जाने पर केंद्र सरकार की आलोचना की है। संजय राउत ने समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव को पद्मविभूषण दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन्होंने कारसेवकों पर गोली चलवाई उनको तो आपने पुरस्कार दे दिया, लेकिन अयोध्या के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाने वाले बालासाहेब को भूल गए।

‘मुलायम देश के बड़े नेता थे, लेकिन…’


राऊत ने कहा, ‘मुलायम सिंह यादव देश के बड़े नेता थे, रक्षामंत्री थे, 3 बार मुख्यमंत्री रहे, समाजवादी आंदोलन के बड़े नेता रहे लेकिन उनके साथ हमारे मतभेद रहे। जब अयोध्या का आंदोलन चल रहा था तो उन्होंने कारसेवकों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया था। उन्होंने कहा था कि और कारसेवकों को गोली मारनी होती तो भी पीछी नहीं हटता और बाबरी मस्जिद की रक्षा करता। उसके बाद बीजेपी, बजरंग दल, VHP सभी ने मुलायम सिंह के ऊपर मुकदमा दायर करने की मांग भी की थी। हिंदुओं का हत्यारा तक कहने से नहीं चूके थे।’

‘वीर सावरकर को भारत रत्न क्यों नहीं दिया’

राऊत ने परोक्ष रूप से मुलायम को पद्मविभूषण दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘आज उनकी ही सरकार ने उन्हें पद्मविभूषण से गौरवान्वित किया है, और मैं उस पर कुछ नहीं कहूंगा। लेकिन यदि आप मुलायम का गौरव करते है तो फिर वीर सावरकर को भारत रत्न क्यों नहीं दिया। आप बालासाहेब ठाकरे को आप भूल गए, जिन्होंने अयोध्या के आंदोलन में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। कारसेवकों पर गोली चलाने वाले को सम्मान दिया लेकिन आंदोलन को ऊर्जा देने वाले बालासाहेब ठाकरे को आप भूल गए।’

योगी के सवाल पर बचते दिखे संजय राउत

राउत ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर भी निशाना साधते हुए कहा, ‘महाराष्ट्र में जो लोग (शिंदे) खुद को बालासाहेब ठाकरी के विचारधारा के मालिक मानते हैं, और सरकार में हैं, वे कहां गए। उनकी जिम्मेदारी है। विधानसभा में चित्र लगाकर अपने आपको बालासाहेब ठाकरे का वारिस नहीं मान सकते हैं।’ वहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘सनातन भारत का राष्ट्रीय धर्म है’ वाले बयान पर सवाल से राऊत बचते दिखे। उन्होंने कहा, ‘ठीक है न, यह आप जाकर उनसे पूछिये, मैं क्यू बोलूं यहां बैठकर।’

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