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FIFA World Cup 2022: कतर पर लगा ‘स्पोर्ट्सवॉशिंग’ का आरोप, फैंस बेपरवाह

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सऊदी अरब में हाल ही में प्रमुख मुक्केबाजी आयोजनों और बीजिंग में आयोजित होने वाले 2022 शीतकालीन ओलंपिक खेलों की भी आलोचना हुई थी
भाषा / नई दिल्ली November 22, 2022






पुरुष फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी के लिए कतर को चुनने के फीफा के फैसले की पहले दिन से ही आलोचना होती रही है। मानवाधिकारों के प्रति देश के रवैये और प्रवासी श्रमिकों के साथ इसके व्यवहार पर सवाल उठते रहते हैं। कुछ लोगों के लिए, पूरी घटना “स्पोर्ट्सवॉशिंग” की अवधारणा का उदाहरण पेश करती है।

स्पोर्टसवॉशिंग शब्द का इस्तेमाल तब किया जाता है जब अपनी खराब राजनीतिक या मानवीय छवि को सुधारने (और उससे ध्यान बंटाने) के लिए खेल को सॉफ्ट पावर के उपकरण के रूप में उपयोग किया जाता है। और एक पीआर कवायद के रूप में, पुरुषों का विश्व कप एक बड़ा आयोजन है। पिछला विश्व कप एक अन्य विवादास्पद मेजबान राष्ट्र, रूस द्वारा आयोजित किया गया था, जिसे दुनिया भर में 3.5 अरब लोगों ने देखा।

छवि में सुधार के साधन के रूप में खेल का उपयोग कोई नई घटना नहीं है। खेल के माध्यम से ब्रांड प्रबंधन लंबे समय से दुनिया की कई प्रसिद्ध कंपनियों के एजेंडे में शीर्ष पर रहा है। आंशिक रूप से ऐसा इसलिए है क्योंकि खेल प्रशंसकों में ऐसी शक्तिशाली भावनाओं को जगाने में सक्षम है। समर्थक अक्सर टीमों और व्यक्तिगत एथलीटों के साथ मजबूत बंधन बनाते हैं – और उन बंधनों का उपयोग निगमों (प्रमुख प्रायोजकों के रूप में) और राष्ट्रों (घटना मेजबानों के रूप में) द्वारा अपनी सार्वजनिक छवि और लोकप्रियता में सुधार के लिए किया जा सकता है। और हां, यह सिर्फ फुटबॉल नहीं है जो स्पोर्ट्सवॉशिंग के आरोपों के प्रति अतिसंवेदनशील है।

सऊदी अरब में हाल ही में प्रमुख मुक्केबाजी आयोजनों और बीजिंग में आयोजित होने वाले 2022 शीतकालीन ओलंपिक खेलों की भी आलोचना हुई थी। इस बीच ब्रिटिश साइक्लिंग पर “ग्रीनवॉशिंग” का आरोप लगाया गया – स्पोर्ट्सवॉशिंग के समान लेकिन पर्यावरण पर विशेष ध्यान देने के बाद – इसने शेल के साथ एक नए प्रायोजन सौदे की घोषणा की।

लेकिन जबकि आलोचकों ने सार्वजनिक धारणाओं को आजमाने और बदलने के लिए खेल आयोजनों का उपयोग करने की रणनीति के खिलाफ आवाज उठाई की, प्रशंसकों ने क्या किया? क्या स्पोर्ट्सवॉशिंग और ग्रीनवॉशिंग के आरोप वास्तव में उनके लिए मायने रखते हैं? हमारा हालिया अध्ययन, जिसमें खेल प्रशंसकों और टीम के साथ उनके संबंधों को देखा गया है, यह बताता है कि स्पोर्ट्सवॉशिंग में शामिल होने के आरोप वास्तव में मायने नहीं रखते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रशंसक जो एक टीम (और अपने साथी प्रशंसकों के साथ) के साथ मजबूत संबंध का आनंद लेते हैं, वे आमतौर पर उस टीम की आलोचना करने से बचते हैं जिसका वे समर्थन करते हैं।

यह पहचान की मजबूत भावना की रक्षा करने का एक तरीका है जो एक प्रशंसक के भीतर किसी टीम का वफादार सदस्य होने से आता है। इस खोज से पता चलता है कि स्पोर्ट्स क्लबों को वास्तव में सामाजिक या पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार तरीके से कार्य करने पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए – क्योंकि उनके कार्यों को अच्छी तरह अनदेखा किया जा सकता है। प्रशंसकों की धारणाओं और खेल टीमों के ब्रांडों पर ध्यान केंद्रित करने वाले एक अन्य अध्ययन में, हमें प्रशंसकों के दृष्टिकोण से कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी और ब्रांड इक्विटी (क्लब ब्रांड का मूल्य) के बीच कोई सीधा संबंध नहीं मिला। सामाजिक गैरजिम्मेदारी



इसका मतलब यह है कि सामाजिक रूप से जिम्मेदार संगठन माना जाना स्वतः ही संगठन के ब्रांड के लिए उच्च मूल्य की ओर नहीं ले जाता है। यह खेल संगठनों को अपनी प्रथाओं को बदलने और सामाजिक मुद्दों के प्रति अपने दृष्टिकोण में सुधार करने के लिए बहुत कम प्रेरणा देता है। ये निष्कर्ष बताते हैं कि भले ही खेल के माध्यम से किसी राष्ट्र या संगठन की छवि को साफ करने का प्रयास बढ़ रहा हो, कई प्रशंसकों के लिए वे बहुत कम महत्व के हो सकते हैं। वे लोग, जो नियमित रूप से टिकटों के लिए भुगतान करते हैं और अन्य तरीकों से टीमों के साथ जुड़ते हैं, खेल के वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र में सबसे महत्वपूर्ण हितधारकों में से एक हैं। लेकिन हमारा शोध बताता है कि उनमें से कुछ विशेष रूप से सामाजिक जिम्मेदारी को महत्व नहीं देते हैं। और अगर वे ऐसा करते भी हैं, तो ऐसा लगता है कि कई लोग टीम और अन्य प्रशंसकों के प्रति अपनी वफादारी को प्राथमिकता देते हुए, अपने क्लब के व्यवहार पर आंखें मूंदने को तैयार हैं। नतीजतन, खेल क्लबों को व्यवसायों के रूप में व्यवहार करने के तरीके में सुधार करने के लिए कम (या शून्य भी) प्रेरणा के साथ प्रस्तुत किया जाता है। यहां तक ​​कि अगर उन्हें प्रचारकों और सोशल मीडिया पर आलोचना भी मिलती है, तो उनके प्रशंसकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और वह पहले की तरह उनके प्रति शायद वफादार बने रहेंगे। 

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UP By Poll Result 2022: मैनपुरी में डिंपल यादव को भारी बढ़त, रामपुर और खतौली में भी गठबंधन प्रत्याशी आगे

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भाषा / नई दिल्ली December 08, 2022






उत्तर प्रदेश की मैनपुरी लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव की मतगणना के ताजा रुझानों में समाजवादी पार्टी (SP) की उम्मीदवार डिंपल यादव ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के रघुराज सिंह शाक्य पर एक लाख से अधिक मतों की बेहद मजबूत बढ़त बना ली है। रामपुर विधानसभा उपचुनाव में भी सपा के उम्मीदवार आगे हैं जबकि खतौली में उसकी सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के प्रत्याशी भी बढ़त बनाए हुए हैं। 

 

मैनपुरी लोकसभा सीट और दोनों विधानसभा सीटों के उपचुनाव की मतगणना जारी है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक डिंपल यादव शाक्य से 1.11 लाख के करीब मतों से आगे हैं। फिलहाल, वह बेहद मजबूत स्थिति में दिख रही हैं। खतौली सीट पर रालोद प्रत्याशी मदन भैया ने मतगणना के ताजा आंकड़ों में भाजपा उम्मीदवार राजकुमारी सैनी पर 8,534 मतों से बढ़त बना ली है। रामपुर विधानसभा उपचुनाव की मतगणना के शुरुआती रुझान में सपा के आसिम राजा अपने निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के आकाश सक्सेना से 5,100 मतों से आगे हैं। 

 

सपा के विधायक और पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल सिंह यादव ने एक ट्वीट में कहा, ‘मैनपुरी संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं से मिले आशीर्वाद, स्नेह और अपार जनसमर्थन के लिये सम्मानित जनता, शुभचिंतकों, मित्रों और कर्मठ कार्यकर्ताओं का हृदय से आभार। जसवंत नगर की सम्मानित जनता द्वारा डिंपल यादव को दिये गये आशीर्वाद के लिये जसवंतनगर वासियों को सहृदय धन्यवाद।’

 

शिवापाल ने सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव की समाधि पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि भी अर्पित की और कहा कि परिवार एकजुट होकर लड़ा, इसलिए पार्टी ‘बड़ी जीत’ की ओर अग्रसर है। उन्होंने संवाददाताओं से बातचीत में कहा, ‘नेताजी (मुलायम सिंह यादव) और समाजवादी सरकार ने मैनपुरी में जो विकास किया है, उसकी वजह से यह ‘बड़ी जीत’ मिली है। मैनपुरी में आज भी नेताजी का जलवा कायम है।’

 

सपा अध्यक्ष से अपने सभी गिले-शिकवे भुलाकर मैनपुरी उपचुनाव में डिंपल के पक्ष में प्रचार करने वाले शिवपाल ने कहा, ‘अब जो भी चुनाव होगा, हमारा पूरा परिवार एक होकर ही लड़ेगा। हमारी बहू (डिंपल) एक बड़ी जीत की ओर इसलिए अग्रसर है, क्योंकि पूरा परिवार एक होकर लड़ा।’ शिवपाल ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के निर्देश पर मैनपुरी के अधिकारियों ने सपा कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न किया। उन्होंने कहा कि जनता ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए सपा को रिकॉर्ड वोट दिए। 

 

सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल ने उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पर निशाना साधते हुए कहा कि उपचुनाव के जो रुझान आ रहे हैं, उससे जाहिर होता है कि सपा अगले लोकसभा चुनाव में बढ़त बनायेगी। मौर्य ने एक ट्वीट में कहा था कि उपचुनाव के नतीजे वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से दूरगामी संकेत देंगे।

 

मैनपुरी लोकसभा सीट मुलायम सिंह यादव के निधन के कारण रिक्त हुई है जबकि रामपुर सदर और खतौली विधानसभा सीट क्रमशः सपा विधायक आजम खां और भाजपा विधायक विक्रम सैनी को अलग-अलग मामलों में सजा सुनाए जाने के कारण खाली हुई हैं। इनमें से मैनपुरी लोकसभा और रामपुर सदर विधानसभा क्षेत्र सपा के गढ़ माने जाते हैं। इन सीटों के उपचुनाव के तहत इसी महीने पांच दिसंबर को मतदान हुआ था। 



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Air india 40 करोड़ डॉलर के निवेश से विमानों के पुराने बेड़े को करेगी अपग्रेड

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भाषा / नई दिल्ली 12 08, 2022






विमानन कंपनी एयर इंडिया (Air India) ने गुरुवार को कहा कि उसकी योजना 40 करोड़ डॉलर का निवेश करके 27 बोइंग बी787-8 विमानों और 13 बी777 विमानों समेत चौड़े आकार के अपने दोनों बेड़ों को नए जैसा बनाने की है।


एयरलाइन ने एक बयान में बताया कि इसके तहत केबिन के मौजूदा इंटीरियर को पूरी तरह से बदल दिया जाएगा और नए किस्म की सीट और विमान के भीतर मनोरंजन की सबसे अच्छी व्यवस्था सभी श्रेणियों में की जाएगी।


इसमें बताया गया कि दोनों बेड़ों में महंगे एवं सुविधाजनक इकोनॉमी केबिन की शुरुआत की जाएगी तथा बी777 में प्रथम श्रेणी का केबिन बहाल किया जाएगा। 



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Gujarat Election Result 2022 : रुझानों में भाजपा रिकार्ड जीत की ओर

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गुजरात विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) रिकार्ड जीत की ओर बढ़ती दिख रही है। पांचवें दौर की मतगणना के बाद वह विधानसभा की 182 सीटों में से 155 पर बढ़त हासिल कर चुकी है।

निर्वाचन आयोग के मुताबिक कांग्रेस 18 सीटों के साथ दूसरे और आम आदमी पार्टी छह सीटों के साथ तीसरे स्थान पर है।

तीन सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने बढ़त हासिल कर रखी है। आंकड़ों के मुताबिक भाजपा को अभी तक 53.62 प्रतिशत मत मिले हैं जबकि कांग्रेस को 27 और आप को 13 प्रतिशत।

यही रूझान आगे भी जारी रहे तो भाजपा ना सिर्फ गुजरात विधानसभा चुनाव में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेगी, बल्कि वह 149 सीटों पर जीत के कांग्रेस के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ देगी। कांग्रेस ने 1985 के चुनाव में माधवसिंह सोलंकी के नेतृत्व में 149 सीटें जीती थी। राज्य विधानसभा के चुनाव में किसी भी दल द्वारा जीती गई सीटों की यह सर्वाधिक संख्या है। अभी तक यह एक रिकार्ड है। भाजपा राज्य में लगातार सातवीं विधानसभा चुनाव जीत की ओर अग्रसर है।

साल 1995 से उसने राज्य के सभी विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की है। भाजपा यदि यह चुनाव जीत लेती है तो वह पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों के लगातार सात चुनाव के जीत के रिकार्ड की भी बराबरी कर लेगी। ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस)’ के शोध कार्यक्रम ‘लोकनीति’ के सह-निदेशक संजय कुमार ने कहा कि भाजपा अगर गुजरात का चुनाव जीत लेती है तो इससे उसकी हौंसला आफजाई होगी।

उन्होंने कहा कि यह भाजपा के कार्यकर्ताओं में उत्साह भरेगा और इस धारणा को मजबूत करेगा कि पार्टी 2024 का लोकसभा चुनाव जीतेगी। मोदी सरकार बढ़ती महंगाई, धीमी वृद्धि और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से जूझ रही है, लेकिन आर्थिक परेशानियों से गुजरात में भाजपा की लोकप्रियता में सेंध लगने की संभावना नहीं है। गुजरात दशकों से भाजपा का गढ़ रहा है।

मोदी 2001 से 2014 तक राज्य के मुख्यमंत्री थे। गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए मतगणना राज्य के 37 मतदान केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा और भारत निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में बृहस्पतिवार सुबह शुरू हुई। ‘आप’ के चुनावी मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है, जिससे कांग्रेस की परेशानी बढ़ी हुई है। गुजरात में बहुमत के लिए कुल 182 सीट में से किसी भी पार्टी को 92 का आंकड़ा छूना होगा। चुनाव बाद के सर्वेक्षणों में भाजपा के आसान जीत दर्ज करने और लगातार सातवीं बार राज्य में सरकार बनाने का पूर्वानुमान लगाया गया है।

इस महीने की शुरुआत में हुए दो चरणों के चुनाव के नतीजों पर कांग्रेस और आप के प्रदर्शन पर अधिक नजरें थीं। दोनों दल राज्य में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल करने के लिए संघर्ष में उलझी हुई दिख रही हैं। कांग्रेस से 2017 के पिछले विधानसभा चुनाव के अपने शानदार प्रदर्शन को दोहराने की उम्मीद नहीं थी। अब तक के रुझानों के मुताबिक कांग्रेस को आम आदमी पार्टी ने खास नुकसान पहुंचाया है।

पार्टी की ओर से चुपचाप और बगैर भारी शोर शराबे के चुनावी अभियान चलाने की रणनीति विफल साबित होती दिख रही है। कांग्रेस ने मुख्य रूप से घर-घर अभियान पर जोर दिया। साल 2017 के चुनावों में आक्रामक प्रचार करने वाले उसके नेता राहुल गांधी इस बार के चुनाव से दूर रहे। उनका पूरा जोर भारत जोड़ो यात्रा पर रहा।

कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेता भी चुनाव प्रचार से दूर रहे। यह देखा जाना बाकी है कि इस चुनाव में आप के प्रदर्शन से क्या उसके नेता अरविंद केजरीवाल को 2024 में होने वाले संसदीय चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपनी जगह पक्की करने में मदद मिलती है या नहीं। आप ने इस चुनाव में आक्रामक तरीके से चुनाव अभियान चलाया था। गुजरात का चुनाव उसके लिए खुद को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित करने का एक अवसर भी था।

भाजपा के कई विधायक अब तक के रुझानों में आगे चल रहे हैं। इनमें जीतू वाघानी, हार्दिक पटेल, पूर्णेश मोदी, कनुभाई देसाई और कई अन्य चर्चित चेहरे शामिल हैं। कांग्रेस के दो प्रमुख नेता परेश धनानी और जिग्नेश मेवानी क्रमश: अमरेली और बडगाम में अपने-अपने प्रतिद्वंद्वियों से पीछे है। हालांकि उसके सबसे वरिष्ठ नेता अर्जुन मोढवाडिया पोरबंदर से जीत की ओर बढ़ रहे हैं। आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार इसुदान गढ़वी खम्भालिया विधानसभा सीट से आगे हैं।

जमजोधपुर, देडियापारा, धारी, व्यारा, बोताड, भिलोदा, गरियाधर और लिंबायत और कुछ अन्य सीटों पर भी आप के उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए हैं। आप के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया सूरत के कतरगाम सीट पर पीछे हैं। वराछा रोड से आप के उम्मीदवार अल्पेश कथीरिया भी पीछे हैं। धनेरा और वागोडिया से निर्दलीय उम्मीदवारों ने बढ़त हासिल कर रखी है।

भाजपा ने राज्य में 27 साल के शासन के बाद सत्ता विरोधी भावनाओं से जूझते हुए यह चुनाव लड़ा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पार्टी के लिए ‘तुरुप का इक्का’ थे और सत्तारूढ़ दल ने सत्ता विरोधी लहर के मुकाबले के लिये ‘ब्रांड मोदी’ पर भरोसा किया। चुनावों में प्रमुख मुद्दों में बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि, राज्य के कुछ हिस्सों में पानी नहीं पहुंचना, बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण और किसानों को अत्यधिक बारिश के कारण फसल क्षति का उचित मुआवजा नहीं मिलना था।

इस बार मतदान प्रतिशत 2017 की तुलना में लगभग चार प्रतिशत कम हुआ। राज्य में 2017 में 68.39 प्रतिशत के मुकाबले इस बार सिर्फ 64.33 प्रतिशत मतदान हुआ। साल 2017 में भाजपा ने 99 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि कांग्रेस ने 77 सीटें जीती थी। भारतीय ट्राइबल पार्टी को दो और एक सीट राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के खाते में गई थी। तीन निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी जीत हासिल की थी। 



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