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सेंसेक्स 1,000 अंक टूटकर खुला, निफ्टी 17,800 से नीचे 

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डिजिटल डेस्क, मुंबई। देश का शेयर बाजार कारोबारी सप्ताह के तीसरे दिन (14 सितंबर 2022, बुधवार) गिरावट के साथ खुला। इस दौरान सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही लाल निशान पर रहे। बंबई स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के 30 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 1,000 अंक टूटकर खुला। वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के 50 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक निफ्टी 17,800 से नीचे खुला। 

फिलहाल, सेंसेक्स 566.70 अंक यानी कि 0.94% की गिरावट के साथ 60,004.38 के स्तर पर कारोबार कर रहा है। वहीं निफ्टी 162.55 अंक यानी कि 0.90% की गिरावट के साथ 17,907.50 के स्तर पर कारोबार कर रहा है। 

आपको बता दें कि, बीते कारोबारी दिन (13 सितंबर 2022, मंगलवार) बाजार बढ़त के साथ खुला था। इस दौरान सेंसेक्स 329.73 अंक ऊपर 60,444.86 के स्तर पर खुला था। वहीं निफ्टी 99.50 अंक की बढ़त के साथ 18,035.80 के स्तर पर खुला था। 

जबकि शाम को भी बाजार बढ़त के साथ ही बंद हुआ था। सेंसेक्स जहां 455.95 अंक यानि कि 0.76% ऊपर 60,571.08 के स्तर पर बंद हुआ था। वहीं निफ्टी 133.70 अंक यानि कि 0.75% की बढ़त के साथ 18,070.05 के स्तर पर बंद हुआ था।   



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गुजरात चुनाव : सरकार बरकरार रहने पर उद्योग खुश

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उद्योगपतियों ने गुजरात में शासन की निरंतरता और स्थिरता बनाए रखने के लिए लोगों के फैसले की सराहना
विनय उमरजी /  12 08, 2022






उद्योग ने गुजरात विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की रिकॉर्डतोड़ और लगातार सातवीं जीत का स्वागत किया है। एक ओर जहां उद्योगपतियों ने गुजरात में शासन की निरंतरता और स्थिरता बनाए रखने के लिए लोगों के फैसले की सराहना की है, वहीं दूसरी ओर कुछ लंबित सुधारों को लेकर भी उसकी उम्मीदें जगी हैं।

गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (जीसीसीआई) के अध्यक्ष पाठिक पटवारी ने कहा, ‘यह विकास समर्थित फैसला है और मौजूदा सरकार द्वारा किए जा रहे अच्छे काम का नतीजा है। उद्योग भी नहीं चाहता था इस निरंतरता में कोई रुकावट आए और शासन में किसी तरह का परिवर्तन हो, क्योंकि यह उसके लिए एक झटका साबित हो सकता था।’

वहीं अहमदाबाद के पशुओं की टीका कंपनी हेस्टर बायोसाइंसेज लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी राजीव गांधी ने कहा कि गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा की एक और जीत का अर्थ होगा कि सभी सुधारों और योजनाओं में निरंतरता आएगी। इससे न केवल उद्योग को लाभ मिलेगा बल्कि अधिक रोजगार का भी सृजन होगा।

गांधी ने कहा, ‘कोविड महामारी के बाद आर्थिक विकास तेजी से आगे बढ़ेगा और मौजूदा सरकार के और मजबूत हो जाने से यह औद्योगिक विकास में भी इजाफा करेगा। साथ ही हम अगले साल के लिए नियोजित क्षमता विस्तार को लेकर भी काफी उत्साहित हैं।’

पटवारी के अनुसार, हालांकि सत्तारूढ़-भाजपा सरकार औद्योगिक सुधारों के साथ आ रही थी। उसपर उद्योग की लंबित मांगों और राजकोषीय बोझ का भी कुछ बोझ था जिसे एक नई सरकार के लिए उठाना मुश्किल होगा। लंबित मांगों में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के पक्ष में बिजली और भूमि सुधार शामिल थे। जैसे कि एलटी कनेक्शन की सीमा को 100 केवी से बढ़ाकर 150 केवी करना और गुजरात औद्योगिक विकास निगम (जीआईडीसी) के औद्योगिक भूखंडों पर गैर-उपयोग शुल्क को कम करना।

पटवारी ने कहा, ‘बिजली सुधार से एमएसएमई के लिए हर साल 30 लाख रुपये तक बच सकता है, जबकि अभी लगाए जा रहे गैर-उपयोग शुल्क थोड़े अधिक हैं और इसे कम किया जा सकता है। विशेष रूप से जीआईडीसी के औद्योगिक क्षेत्रों में जो बिना बिके कई भूखंडों से असंतृप्त हैं।’

हालांकि, हेमंत कुमार शाह जैसे अर्थशास्त्रियों ने भी अधिक दिख रहे विकास के बीच कुछ संकेतकों को नजरअंदाज किए जाने पर चिंता जताई है। शाह ने कहा, ‘राजकोषीय नीति वक्तव्य में अनुसार अभी गुजरात का राजकोषीय ऋण करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये है और अगले दो वर्षों में इसके 4.5 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। मौजूदा सरकार की राजकोषीय सूझबूझ दिखाई नहीं दे रही है।

भाजपा सरकार ने अपने चुनाव अभियान में खुद कहा था कि 70 लाख गरीब परिवारों को राशन दिया, यानी मोटे तौर पर 3.5 करोड़ लोग गरीब हैं। गरीबी और बेरोजगारी खासकर ग्रामीण इलाकों में अधिक दिखाई पड़ती है। जिलों को छोड़कर सड़कों का बुनियादी ढांचा अभी भी ठीक नहीं है। वर्तमान चुनाव अन्य बातों के अलावा शहरी सड़कों, फ्लाईओवर, मेट्रो रेल और हाई स्पीड ट्रेनों जैसे दृश्यमान बुनियादी ढांचे के विकास के आधार पर ही जीते जा रहे हैं।’

वहीं दूसरी ओर, कई बड़े निगमों के अर्थशास्त्री और रणनीतिक औद्योगिक सलाहकार सुनील पारेख ने कहा कि सरकार में निरंतरता न केवल नए नियोजित निवेशों को चालू करना सुनिश्चित करेगी बल्कि कुछ सामाजिक-आर्थिक संकेतकों पर भी गौर  करेगी जिन पर कुछ काम करने की आवश्यकता है।

पारेख ने कहा, ‘सरकार आर्थिक विकास की ओर अग्रसर है और अन्य कई राज्यों की तुलना में कहीं बेहतर स्थिति में है। हाल के दिनों में राज्य के जीएसटी आंकड़ों में भी सुधार हुआ है। हालांकि, सामाजिक-आर्थिक संकेतक जैसी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। इन्हें अब मौजूदा सरकार के साथ देखने की आवश्यकता हो सकती है। अन्यथा, एक नए शासन ने पिछली सरकार द्वारा किए गए अधिकांश कार्यों को पूर्ववत करने का प्रयास किया होता।’



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मुख्यमंत्री चुनने के लिए कांग्रेस की बढ़ेगी सिरदर्दी

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हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में पराजय स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा, ‘मैंने अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया है। मैं जनता के विकास के लिए अपना काम जारी रखूंगा। हमें इस हार का आकलन करने की जरूरत है। कुछ वजहों से चुनाव परिणाम की दिशा बदल गई। अगर मुझे दिल्ली बुलाया जाएगा तब मैं दिल्ली जाऊंगा।’ 

स्थानीय लोगों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हार में दो कारकों की अप्रत्यक्ष रूप से अहम भूमिका रही। पहला, इस विधानसभा चुनाव में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 2017 की तुलना में 17 फीसदी अधिक था। दूसरा, अग्निवीर योजना की वजह से राज्य के लोगों में काफी असंतुष्टि रही। 

इस जीत का प्रत्यक्ष कारण कांग्रेस पार्टी का वह वादा था जिसमें उसने कहा कि अगर पार्टी सत्ता में आई तब  मंत्रिमंडल की पहली बैठक में ही पुरानी पेंशन योजना बहाल की जाएगी और पार्टी ने घोषणापत्र में केवल इसका जिक्र करने के बजाय गारंटी देने की बात भी कही। 

भाजपा करीब 20 बागियों को पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ने के लिए मनाने में विफल रही। एक स्थानीय पत्रकार सुनील चड्ढा कहते हैं, ‘इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के  आधिकारिक उम्मीदवार एक ओर वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और भाजपा के बागी लोग चुनाव में खड़े थे।’

हालांकि चुनाव में केवल तीन स्वतंत्र उम्मीदवार ही जीत पाए लेकिन भाजपा का खेल पार्टी के बागियों ने बिगाड़ दिया। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने कूटनीति का सहारा लिया और प्रभारी महासचिव राजीव शुक्ला की धमकी भी काम आई जिसकी वजह से ज्यादातर बागी चुनावी मैदान से हटने के लिए मजबूर हुए। 

भाजपा सरकार की हार का एक प्रमुख कारण उदासीन तरीके से प्रशासनिक कार्यों को निपटाना था। एक केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने में भी काफी देरी हुई जिसका वादा 2017 के चुनाव के दौरान ही किया गया था। महज छह महीने पहले ही इसके लिए जमीन का हस्तांतरण किया गया। हिमाचल प्रदेश में नई सड़क परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं। 

हालांकि कांग्रेस की अपनी ही चुनौतियां हैं। पार्टी के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह के निधन के बाद कांग्रेस को नेतृत्व में बदलाव को लेकर काफी दिक्कत होगी। सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह उनकी सीट मंडी से निर्वाचित हुईं लेकिन कांग्रेस मंडी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से एक भी विधानसभा सीट जीतने में कामयाब नहीं हो पाई। हालांकि सिंह के बेटे विक्रमादित्य चुनाव जीत गए हैं लेकिन कांग्रेस के लिए मुख्यमंत्री तय करना आसान नहीं होगा।



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गुजरात में भाजपा ने रचा इतिहास

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आदिति फडणीस /  12 08, 2022






प्रदेश में लगातार सातवीं बार सत्ता में आकर भारतीय जनता पार्टी ने नया रिकॉर्ड बनाया है और पार्टी को दो-तिहाई सीटें हासिल हुई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि इस जनादेश से विकास की राजनीति पर फिर से मुहर लगी है  

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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक के बाद एक नेता ने पार्टी की जीत के योगदान के लिए ‘नरेंद्रभाई और अमितभाई’ का नाम लिया लेकिन मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने भी सरकार के प्रदर्शन के जरिये पार्टी की पूरी मदद की। 

चुनावी नतीजों के रुझान आने शुरू होने के बाद गुजरात के भाजपा अध्यक्ष सी आर पाटिल ने कहा, ‘गुजरात के लोगों ने राष्ट्रद्रोही तत्त्वों को खारिज कर दिया है और भाजपा को राज्य में विकास की रफ्तार को बढ़ाने के लिए वोट दिया है।’ उन्होंने यह भी घोषणा की कि भूपेंद्र पटेल राज्य के मुख्यमंत्री बने रहेंगे और उनका शपथ ग्रहण समारोह 12 दिसंबर को होगा।

मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही पटेल ने विकास पर काम किया है और आठ जिलों में नल के जरिये जलापूर्ति, जैविक खेती के लिए 100 करोड़ रुपये का फंड, सार्वजनिक बस तंत्र के आधुनिकीकरण जैसी परियोजनाएं आम लोगों के लिए केंद्रित थीं। सेमीकंडक्टर संयंत्र बनाने के लिए 1.54 लाख करोड़ रुपये का वेदांत-फॉक्सकॉन निवेश पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से स्थानांतरित होकर गुजरात के खाते में आया जो उनके ही सफलता के खाते से जुड़ गया।

पटेल का काम स्थानीय स्तर पर काफी व्यापक रहा और यही वजह है कि मोदी और शाह को ग्रामीण क्षेत्र की जनसभाओं में भी भारत को जी20 की अध्यक्षता का मौका मिलने और वैश्विक स्तर पर भारत की पैठ बढ़ाने जैसी बातों का जिक्र करने की गुंजाइश भी मिल गई।

वहीं कांग्रेस को आम आदमी पार्टी (आप) और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलिमीन (एआईएमआईएम) की वजह से दोतरफा नुकसान हुआ। आप ने जहां कांग्रेस की एक बड़ी वोट हिस्सेदारी में सेंध लगाई, वहीं एआईएमआईएल ने अपने 13 उम्मीदवार चुनाव में उतार दिए जिनमें से दो गैर-मुस्लिम भी थे जिन्होंने मुस्लिम दबदबे वाली सीटों जैसे जमालपुर-खड़िया और वडगाम में कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया और भाजपा को बढ़त दे दी। कांग्रेस के इमरान खेड़ावाला जमालपुर-खड़िया सीट से हार गए जबकि जिग्नेश मेवाणी बेहद कम अंतर से जीत पाने में सफल रहे।

वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम बहुल आबादी वाले चुनावी क्षेत्रों में भाजपा ने 17 में से 12 सीटें जीत लीं और इस तरह भाजपा को इन इलाकों में छह सीटों का फायदा हुआ जबकि पार्टी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा था। उदाहरण के तौर पर मुस्लिम बहुल सीट दरियापुर कांग्रेस के खाते में 10 साल से थी लेकिन कांग्रेस के विधायक गयासुद्दीन शेख को हराकर भाजपा उम्मीदवार कौशिक जैन जीत गए। 

भाजपा नेतृत्व ने इस बार के चुनाव में पार्टी के तीन अहम नेताओं, पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी, नितिन पटेल और भूपेंद्र सिंह चुडासमा जैसे मंत्रियों को विधानसभा चुनाव से दूर रखने में सफलता पा ली जिसकी वजह से अब भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश करने में आसानी हो गई है। संभव है कि वह अपनी टीम को मंत्रिमंडल में फिर से शामिल करें। हालांकि भाजपा को मिली बड़ी जीत से अब मंत्रियों को चुनने में दिक्कत हो सकती है 

क्योंकि अब मंत्रीपद के मुकाबले दावेदार ज्यादा होंगे। यह जीत लोकसभा चुनाव के आगाज को इंगित कर रही है और अब यह देखना होगा कि कांग्रेस अपनी खस्ता हालत से कैसे उबरने की कोशिश करेगी। पार्टी के गुजरात प्रभारी रघु शर्मा ने चुनावी नतीजे के रुझान आने के तुरंत बाद ही इस्तीफा दे दिया।



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