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ये पाकिस्तानी एक्ट्रेस सनी देओल के साथ नहीं धर्मेंद्र के साथ करना चाहती हैं काम, कभी थीं सलमान की गर्लफ्रेंड

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सलमान खान की गर्लफ्रेंड्स की फेहरिस्त काफी लंबी रही है. इन्हीं में से एक पाकिस्तानी एक्ट्रेस भी रही हैं, जिनके माता पिता वैसे तो भारत के थे लेकिन पार्टिशन के समय पाकिस्तान जाकर बस गए. जिस वजह से ये हसीना भी पाकिस्तानी मानी गई. हालांकि बॉलीवुड की कई फिल्मों में उन्होंने काम किया. सबसे ज्यादा सुर्खियों में इसलिए रहीं कि उनका नाम बतौर सलमान खान की गर्लफ्रेंड लिया जाता रहा. ये एक्ट्रेस हैं सोमी अली जो बहुत सालों से बड़े फिल्मी पर्दे से दूर हैं. हाल ही में सोमी अली ने सनी देओल की गदर टू पर अपनी राय पेश की है.

सोमी अली ने गदर 2 के लिए कहा कि वो इस फिल्म को देखने के लिए बेताब हैं. सोमी अली ने कहा कि फिल्म जिस सब्जेक्ट पर बनी है वो उनके दिल के बहुत करीब है क्योंकि उनके माता पिता भी भारत में जन्म लेकिन पार्टीशन के समय पाकिस्तान चले गए. सोमी अली का कहना है कि वो हमेशा ये चाहती थीं कि उन्हें सनी देओल के साथ काम करने का मौका मिले लेकिन ऐसा नहीं हो सका. हालांकि उन्हें धर्मेंद्र के साथ काम करने का मौका मिला. तब उन्होंने धर्मेंद्र के साथ उर्दू में पाकिस्तान के बारे में बहुत सी बातें की थीं. आगे वो कहती हैं कि फिल्म गदर 2 देखने के लिए वो अब और इंतजार नहीं कर सकतीं.

सोमी अली ने गदर 2 के बारे में कहा में दो देशों के रिश्तों को लेकर बड़ा गहरा अर्थ छिपा है. सोमी अली ने कहा कि प्यार वाकई कोई सरहद नहीं जानता. दोनों देशों के लोग शुरू से घुलमिल कर रहना चाहते हैं. वो ईद और दिवाली मिलजुलकर मनाते हैं. सनी देओल की फिल्म गदर 2 यही मैसेज देती है कि दोनों मुल्कों के बीच तनाव की वजह राजनेता ही हैं. सकीना को भी अपना प्यार पॉलिटिकल एजेंडा की वजह से गंवाना पड़ा था. आगे सोमी अली ने कहा कि फिलहाल उन्होंने गदर 2 नहीं देखी है लेकिन गदर वन देखी है जिसके आधार पर उन्होंने ये बात कही. बता दें कि अब सोमी अली अपना खुद का एनजीओ चलाती हैं. जिसमें वो मुख्य रूप से एशियाई महिलाओं के लिए काम करती हैं.



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महाराष्ट्र में गणेश विसर्जन की धूम, भक्तों की लगी भीड़

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Image Source : INDIA TV
महाराष्ट्र में गणेश विसर्जन की धूम

महाराष्ट्र: पूरे देश में बड़े ही धूम-धाम के साथ गणेश विसर्जन का त्योहार मनाया जा रहा है। महाराष्ट्र की सड़कों पर भी भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। विसर्जन के दौरान अभिनेता और नेता से लेकर आम आदमी, हर कोई धूम-धाम के साथ अपने प्यारे गणपति को विदाई देता है और उनसे अगले साल फिर से आने के लिए आग्रह करता है।

मुंबई में विसर्जन की धूम

आज अनंत चतुर्दशी है और ऐसे पावन मौके पर पूरे महाराष्ट्र में गणपति बप्पा को विदाई देने के लिए लोग अपने घरों से निकलकर चौपाटी पहुंच रहे हैं। इस दौरान लोग बड़े मंडलों समेत ङर घर में विराजे गणपति बप्पा की मूर्तियां लेकर चौपाटी में विसर्जन के लिए पहुंच रहे हैं। इस दौरान चौपाटी पर भक्तों की काफी भारी भीड़ देखने को मिल रही है।

चौपाटी पर भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस ने एंट्रेंस पर बैरिकेंडिंग कर दी है। इसके अलावा पुलिस ने दादर चौपाटी पर नजर रखने के लिए एक वाच टावर भी बनाया है। मूर्तियों के विसर्जन के लिए चौपाटी पर लाइफ गार्ड और वालंटियर मौजूद हैं। 

महाराष्ट्र के पूर्व CM भी विसर्जन करने पहुंचे

गणपति बप्पा को विदाई देने के लिए हर कोई चौपाटी पहुंच रहा है। इस दौरान महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौहान भी अपने परिवार के साथ गणपति बप्पा का विसर्जन करने पहुंचे। अशोक चौहान ने अपने परिवार के साथ गणपति बप्पा के जयकारे लगाते हुए उन्हें विदाई दी।

आपको बता दें कि गणपति बप्पा को विदाई देने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा कि, बप्पा को विदाई देते समय काफी दुख हो रहा है।

नागपुर में विसर्जन शुरू

नागपुर शहर में प्रशासन ने गणपति विसर्जन के लिए लोगों को 2 बजे का समय दिया था। 2 बजते ही पूरे शहर में गाना और बाजे के साथ सभी भक्त भगवान गणेश की विदाई के लिए निकल गए। 

इस साल नागपुर में करीब 3 लाख घरों में भगवान गणेश विराजमान थे। इसके अलावा करीब 1212 सार्वजनिक मंडलों में भगवान गणेश की स्थापना की गई थी। 

नागपुर के राजा रेशम बाग से विसर्जन के लिए निकले

जिस तरह एक राजा शहर का भ्रमण करने के लिए निकलता है और उसे देखने के लिए जनता सड़क किनारे खड़ी रहती है, कुछ इसी तरह का दृश्य दिखा जब रेशम बाग के पंडाल से नागपुर के राजा विसर्जन के लिए निकलें। 1 बजे शुरू हुई इस यात्रा के दौरान नागपुर के राजा करीब 22 किमी की यात्रा तय कर विसर्जन के लिए जाएंगे।

आपको बता दें कि नागपुर के राजा की विशेषता यह है कि हर साल उनकी ऊंचाई एक इंच बढ़ा दी जाती है। यह उनका 26वां वर्ष है। नागपुर के राजा का स्वर्ण आभूषणों से श्रृंगार किया जाता है और अगले बरस तू जल्दी आ के नारों के साथ लोग हाथ जोड़कर उन्हें विदाई देते हैं।

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MP में भाजपा ने क्यों उतारे बड़े-बड़े दिग्गज? कैलाश विजयवर्गीय ने खुद बताया ‘अपराजेय’ वाला फॉर्मूला

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MP chunav news: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सोमवार को उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट जारी की। 39 सीटों पर कई दिग्गजों को चुनावी मैदान में उतारा गया है। इनमें तीन केंद्रीय मंत्री, चार सांसद और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय शामिल हैं। भाजपा सूत्रों के मुताबिक, दूसरी लिस्ट देखकर राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी आश्चर्यचकित हो गए थे। एक सूत्र ने बताया कि अब अगला सीएम कौन बनेगा यह बताया नहीं जा सकता। पहली लिस्ट में 39 और दूसरी में भी 39 सीटें पर नाम के ऐलान के बाद पार्टी के अंदर और बाहर खुसुर-फुसुर तेज हो गई है। ऐसे में भाजपा के दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय ने खुद बताया कि पार्टी ने यह फैसला क्यों लिया है।

भाजपा का अपराजेय’ वाला फॉर्मूला

कैलाश विजयवर्गीय ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए इंटरव्यू में बताया कि यह फैसला पार्टी नेतृत्व का है। दूसरी लिस्ट में जिन 8 सीनियर नेताओं (तीन केंद्रीय मंत्री, चार सांसद और कैलाश विजयवर्गीय) के नाम का ऐलान किया गया है वो कभी भी चुनाव नहीं हारे हैं। पार्टी ने हम लोगों को इसलिए चुनावी मैदान में उतारा है कि हम भाजपा की जीत को सुनिश्चित कर सकें।

बताया 2024 का भी प्लान

कैलाश विजयवर्गीय ने आगे कहा कि इससे यह पता चल रहा है कि भाजपा इस चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही है। चुनाव में हम सब एक टीम की तरह मैदान में उतरेंगे और सरकार बनने के बाद भी एक टीम की तरह ही काम करेंगे। फिर हम लोग अगले साल होने जा रहे लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित करेंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक बार फिर पीएम बनाएंगे।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में भाजपा ने दो लिस्ट में कुल 78 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया है। दूसरी लिस्ट जारी होने के बाद नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय और सीएम शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री पद के लिए प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। भाजपा ने यही प्लान त्रिपुरा चुनाव में भी अपनाया था जहां माणिक साहा और प्रतिमा भौमिक दोनों को चुनावी समर में उतारा गया था।



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लालू के ‘परबल’ का ‘र’ किसके साथ, क्या है बिहार में ठाकुरों के समीकरण पर RJD-BJP की रार और रणनीति?

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Bihar Politics Over Rajput Community: संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल पर राज्यसभा में राजद की ओर से मनोज झा ने चर्चा की थी। इस दौरान कोटे के अंदर कोटा की मांग करते हुए उन्होंने सभी लोगों से अपने अंदर के ठाकुर को मारने का आह्वान किया था। झा ने वंचितों के लिए भागीदारी सुनिश्चित कराने की सभी लोगों से अपील की थी। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में सदन में ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘ठाकुर का कुआं’ की कुछ लाइनें भी पढ़ीं थीं। अब उनके इस कविता पाठ पर बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक सियासी रार छिड़ा है।

लालू यादव की पार्टी राजद के अंदर ही मनोज झा के ठाकुरों पर दिए बयान का विरोध हो रहा है। पहले पूर्व सांसद आनंद मोहन के MLA बेटे चेतन आनंद ने बयान दिया। बाद में खुद आनंद मोहन तीखी जुबान के साथ कूद पड़े और कह डाला कि अगर वह सदन में होते तो झा की जुबान खींच लेते। उधर, बीजेपी भी राजद सांसद के बयान पर बिहार में खूब हंगामा कर रही है। बीजेपी नेताओं ने पटना में इनकम टैक्स गोलंबर पर धरना प्रदर्शन दिया और झा के माफी नहीं मांगने पर सड़क से लेकर गली-गली तक विरोध की बात कही।

क्या है लालू का ‘परबल’ और उसका ‘र’

दरअसल, ये सारी कवायदें अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर हो रही हैं। राजपूत समाज अगड़ी जाति के तहत आता है। झा यानी ब्राह्मण भी उसी अगड़ी जाति के समुदाय का हिस्सा है। इनके अलावा राजपूत और कायस्थ जातियां भी अगड़ी जातियों में गिनी जाती हैं, जिसे लालू प्रसाद ने 1990 के दौर में कभी ‘परबल’ कहा था और उसकी भुजिया बनाने को कहा था। लालू ने इसी तरह के नारों से समाज के पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को इनके खिलाफ लामबंद कर 15 वर्षों तक राज किया था। परबल का मतलब- प से पंडित, र से राजपूत, ब से बाभन (भूमिहार) और ल से लाला यानी कायस्थ है। 

इसे कथित तौर पर ‘भूरा बाल’ भी कहा गया था। हालांकि, बाद के कई साक्षात्कारों में लालू यादव ने इस बात का खंडन किया कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि ‘भूरा बाल’ साफ करो। यहां भी भूरा बाल से मतलब- भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला से है। लालू-राबड़ी के 15 वर्षों के शासनकाल और बाद के वर्षों में भी अगड़े समाज की तीन जातियों (ब्राह्मण, भूमिहार और कायस्थों) का बहुत ही कम वोट लालू यादव की पार्टी को मिलता रहा है लेकिन राजपूत वोट बैंक में लालू यादव ने शुरुआत से ही सेंधमारी कर रखी है।

बिहार में राजपूत कितना अहम?

बिहार में राजपूतों की आबादी करीब 6 से 8 फीसदी है। 30 से 35 विधानसभा सीटों में इस जाति की मजबूत पकड़ है। 2020 के विधानसभा चुनाव में राज्य की 243 सीटों में से 64 सीटों पर अगड़ी जाति के उम्मीदवारों की जीत हुई है। इनमें से 28 अकेले राजपूत हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में 20 राजपूत उम्मीदवार विधायक बने थे। बीजेपी ने असेंबली चुनावों से पहले अभिनेता सुशांत सिंह का मुद्दा खूब उठाया था। इसका फायदा भी उसे मिला। बीजेपी के 21 राजपूत उम्मीदवारों में से 15 जीतने में कामयाब रहे, जबकि उसकी सहयोगी रही जेडीयू के सात में से दो राजपूत कैंडिडेट ही जीत सके थे। एनडीए गठबंधन में वीआईपी के टिकट पर भी दो राजपूतों ने जीत दर्ज की थी।

राजद का स्ट्राइक रेट सबसे ज्यादा

तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले गठबंधन ने कुल 18 राजपूतों को टिकट दिया था, जिसमें 8 ही जीतकर विधानसभा पहुंच सके। हालांकि, राजद के आठ राजपूत कैंडिडेट में से सात जीतने में कामयाब रहे और सबसे अधिर स्ट्राइक रेट दर्ज की। कांग्रेस ने 10 को टिकट दिया लेकिन जीते सिर्फ एक। इससे पहले यानी 2015 के चुनावों में बीजेपी के 9, आरजेडी के 2, जेडीयू के 6 और कांग्रेस से तीन राजपूत विधायक जीते थे। 

लोकसभा में भी राजपूतों का चला सिक्का

2019 के लोकसभा चुनावों में भी बिहार में राजपूत उम्मीदवारों का सिक्का चला। सबसे ज्यादा सात सीटों पर इसी बिरादरी के लोगों ने जीत दर्ज की। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। इनमें से 39 सीटों पर बीजेपी-जेडीयू के गठबंधन वाली एनडीए ने जीत दर्ज की थी। 39 में सबसे ज्यादा सात पर राजपूत, 5 पर यादव, 3-3 पर भूमिहार- कुशवाहा, वैश्य, दो पर ब्राह्मण, एक-एक पर कायस्थ और कुर्मी, एससी के 6 और अति पिछड़ा वर्ग के 7 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। एक मात्र मुस्लिम चेहरे ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी।

राजपूतों का झुकाव किस ओर? 

चुनावी समीकरणों और हार-जीत के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि भूमिहार, ब्राह्मण और कायस्थ भाजपा के साथ है, जबकि राजपूत वोट अभी भी एकमुश्त भाजपा की तरफ नहीं है। हालांकि 2019 और 2020 में उनकी लामबंदी का फायदा भाजपा को मिला है लेकिन राजपूत समाज लालू का भी कोर वोट बैंक रहा है। लालू रघुवंश प्रसाद सिंह, जगदानंद सिंह, प्रभुनाथ सिंह और उमाशंकर सिंह जैसे राजपूत नेताओं के सहारे इस वोट बैंक में सेंध लगाते रहे हैं। 2009 के संसदीय चुनाव में राजद के तीन राजपूत उम्मीदवार सांसद बने थे। इनमें वैशाली से रघुवंश सिंह, बक्सर से जगदानंद सिंह और महाराजगंज से उमा शंकर सिंह शामिल थे।

आगे की रणनीति क्या?

राजद इस समुदाय का वोट पाने के लिए इनके नेताओं को तरजीह देती रही है। इसी कड़ी में प्रदेश राजद के अध्यक्ष के रूप में जगदानंद सिंह की नियुक्ति है। इसके अलावा चुनावों से ऐन पहले आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद को राजद में शामिल कराना और उनके बेटे को टिकट देना भी शामिल रहा है। हालांकि, हाल के दिनों में रघुवंश सिंह के विवाद के बाद राजद की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर हुई है, जबकि बीजेपी की स्थिति पहले से और मजबूत हुई है।

बीजेपी ने जिस तरह से सुशांत सिंह के मुद्दे को राजपूत अस्मिता और युवा अभिमान से जोड़कर राजपूत वोट बैंक को लामबंद किया है, उसी तरह से नए विवाद के जरिए भी 2024 के लोकसभा चुनाव में भी राजपूतों पर डोरे डाल रही है और सीधे तौर पर राजद को ही खलनायक बता रही है, जिसके पास बीजेपी के बाद सबसे ज्यादा रोजपूत वोट बैंक का शेयर है।



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