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यूक्रेन को हथियार देते कंगाल हो गए NATO और पश्चिमी देश, अब गहरा सकता है संकट

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रूस-यूक्रेन युद्ध (प्रतीकात्मक फोटो)

NATO & western Countries Pauper by giving Arms to Ukraine:रूस के साथ युद्ध चलते अब नौ महीने से अधिक का वक्त बीत चुका है। रूस से मुकाबले के लिए अब यूक्रेन में हथियारों की भूख और बढ़ रही है। मगर इधर यूक्रेन को हथियारों की खेप भेज-भेजकर नाटो समेत पश्चिमी देश भी कंगाल हो चुके हैं। अब फिर से हथियारों के लिए यूक्रेन की भूख पश्चिमी भंडार पर दबाव डाल रही है। जबकि यूक्रेन में युद्ध समाप्त होने का कोई संकेत नहीं दिख रहा है। अबह कीव के पश्चिमी साझेदार इस बात से जूझ रहे हैं कि यूक्रेन को हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति कैसे बनाए रखी जाए?…अभी तक यही विदेशी हथियार युद्ध के मैदान में निर्णायक साबित हुए हैं।

अब नाटो और पश्चिमी देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिना अपने भंडार को कम किए यूक्रेन को हथियारों की सप्लाई देना है। क्योंकि भंडार खाली होना उन देशों को भी खतरे में डाल सकता है। इससे उनकी खुद की तैयारी का स्तर खतरे में पड़ जाएगा। नाम न छापने की शर्त पर बात करने वाले नाटो के एक अधिकारी ने कहा, “मुझे लगता है कि हर कोई अब पर्याप्त रूप से चिंतित है,” सहयोगियों ने युद्ध के मद्देनजर पश्चिमी रक्षा ठेकेदारों को उत्पादन बढ़ाने के लिए कहा था। “भंडार की प्रासंगिकता वापस आ गई है।”

अब यूक्रेन का क्या होगा


अधिकारी ने कहा कि नाटो अब इस बात पर चर्चा कर रहा है कि उत्तरी अटलांटिक संधि के तहत अपने रक्षा दायित्वों को पूरा करने के लिए आवश्यक स्तरों से नीचे गिरने पर सदस्यों का समर्थन कैसे किया जाए। हालांकि यूक्रेन को सैन्य सहायता से संबंधित निर्णय गठबंधन के व्यक्तिगत सदस्यों पर आते हैं। नाटो महासचिव जेन्स स्टोलटेनबर्ग ने बार-बार यूक्रेन को निरंतर सहायता की आवश्यकता के बारे में बात की है। उन्होंने कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आक्रमण से पहले कई “रणनीतिक गलतियां” कीं, जिनमें नाटो और उसके सहयोगियों को “कम आंकना। इसलिए यूक्रेन का समर्थन करना हमारी प्रतिबद्धता में शामिल हैं।  कुछ पूर्व अधिकारी चाह रहे हैं कि बिडेन प्रशासन और नाटो सहयोगियों को जल्द ही संदेश मिल गया था। रूसी हमले के बाद से रक्षा खर्च में जबरदस्त उछाल आया है। भविष्य के लिए स्पाइक जारी रखना होगा। ट्रम्प प्रशासन के दौरान औद्योगिक नीति के लिए रक्षा के पूर्व अमेरिकी उप सहायक सचिव जेब नादनेर ने कहा, “यहां तक ​​​​कि अगर यूक्रेनी लड़ाई नहीं हुई थी, तो भी हमारे भंडार अभी भी बहुत कम हैं।

पश्चिमी देशों के सब हथियारों का भंडार हो गया खाली

मतलब साफ है कि रूस से लड़ते-लड़ते पश्चिमी देशों का युद्धक भंडार खाली हो चुका है। अब हथियारों के भंडारण पर जोर दिया जा रहा है। शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ से युद्ध के समय अमेरिका के पास पर्याप्त युद्धक भंडार थे। मगर संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय सहयोगियों ने सोवियत संघ के पतन के बाद उन भंडारों को कम करना शुरू कर दिया और वाशिंगटन ने आतंकवाद पर युद्ध के साथ-साथ सटीक युद्ध सामग्री और नई प्रौद्योगिकियों पर अधिक निर्भरता की ओर रुख किया। यही वजह है कि अब हथियारों की कमी हो गई है।

नाटो से बताई न जा रही बदहाली

हालत यह है कि नाटो से अपनी कंगाली और बदहाली की कहानी अब किसी से बताई नहीं जा रही। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ साथी फ्रेडरिक कगन ने कहा, “नाटो वास्तव में इस तरह के युद्ध लड़ने की योजना नहीं बनाता है। क्योंकि इस तरह के युद्ध का मतलब है कि आर्टिलरी सिस्टम और बहुत सारे टैंक और गन राउंड के अत्यधिक गहन उपयोग के साथ युद्ध। मगर इसके लिए हमें कभी स्टॉक नहीं किया गया था।” पहले से ही घटते हथियारों के भंडार पर इसका प्रभाव पड़ा है। नादनेर ने कहा कि पेंटागन के भंडार समुद्र से लॉन्च की जाने वाली मिसाइलों जैसे हार्पून और टॉमहॉक्स पर कम हैं।

यूक्रेन को मिले नए रॉकेट लांचर

संयुक्त प्रत्यक्ष हमला गोला बारूद और यूक्रेनियन द्वारा अत्यधिक उपयोग किए जाने वाले हथियार, जैसे जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल और हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम। यूक्रेन को 20 रॉकेट लॉन्चर मिल गए हैं और करीब 18 और आने वाले हैं। “यह विचार कि संयुक्त राज्य अमेरिका में, कुछ मामलों में, पत्रिका के लिए कुछ ही हफ्तों के स्टोर हैं और वे खाली होने जा रहे हैं, यह वास्तव में निवारण को हानि पहुँचाता है। पर्दे के पीछे, संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य नाटो शक्तियों ने पश्चिमी रक्षा कंपनियों से उत्पादन बढ़ाने का आग्रह किया है। 2014 में रूस द्वारा क्रीमिया पर कब्जा करने का आह्वान किया गया था।

हालांकि, वर्तमान और पूर्व अधिकारियों और विश्लेषकों ने कहा कि रक्षा ठेकेदार प्रतिक्रिया देने में धीमे रहे हैं, क्योंकि वे इस आश्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि हथियारों की बढ़ती भूख का युग यहां रहने वाला है।

2015 तक पेंटागन के बल संरचना और निवेश प्रभाग के प्रमुख के रूप में काम करने वाले मार्क कैनसियन ने कहा, “वे जो कहते हैं वह अनिवार्य रूप से मुझे पैसा दिखाते हैं। महत्वपूर्ण कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और कुशल श्रम की कमी के चलते इन विस्तारित फैक्ट्रियों के साथ,  जिन्हें भरने के लिए कोई आदेश नहीं है। इसलिए  उत्पादन में बाधा आ रही है।

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भारत के दो दोस्‍तों ने निभाई दोस्‍ती, हिंद महासागर पर खास मीटिंग से दूर रहकर चीन को दिखाया आईना

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चीन (China) ने 21 नवंबर को हिंद महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region) में आने वाले 19 देशों के साथ एक खास मीटिंग की। इस मीटिंग में भारत तो इनवाइटेड नहीं था लेकिन उसके दो दोस्‍तों ने भी इससे बाहर रहना बेहतर समझा। ऑस्‍ट्रेलिया की तरफ से भारत के साथ एक खास दोस्‍ती निभाई गई और मीटिंग का बहिष्‍कार किया गया।

 



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इन्होंने बना दिया दुनिया में लंबी अवधि तक राष्ट्रपति बने रहने का विश्व रिकॉर्ड, फिर बंपर मतों से जीते

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तियोदोरो ओबियांग (इक्वेटोरियल गिनी के राष्ट्रपति)

Longest Serving President in the World: क्या आप जानते हैं कि दुनिया में सबसे लंबी अवधि तक निर्वाचित राष्ट्रपति बने रहने का रिकॉर्ड किसके पास है?…क्या आप जानते हैं कि हर बार चुनाव में एक ही शख्स आखिर किन वजहों से राष्ट्रपति के चुनाव में बार-बार जीत जाता है? …आखिर कुछ तो वजह होगी जो यह व्यक्ति हर बार चुनाव में विजय पताका फहराता आ रहा है। इस बार वर्ष 2022 के चुनाव में भी जीत हासिल कर 43 वर्षों तक लगातार राष्ट्रपति बने रहने का दुनिया का सबसे बड़ा रिकॉर्ड बना दिया है। आइए आपको बताते हैं कि यह शख्स है कौन?

अफ्रीकी देश इक्वेटोरियल गिनी का नाम आपने शायद सुना होगा। यह देश 1968 में स्पेन से आजाद हुआ था। इस देश के पहले राष्ट्रपति फ्रांसिस्को मैकियास थे। वर्ष 1979 में पहली बार तियोदोरो ओबियांग अपना चाचा फ्रांसिस्को का तख्तापलट कर सत्ता में आ गए। तब से वह लगातार राष्ट्रपति चुने जा रहे हैं। हर बार उन्हें 90 फीसदी से भी अधिक वोट मिलता है। वह करीब 43 वर्षों से इक्वेटोरियल गिनी के राष्ट्रपति हैं। इस बार के चुनाव में भी ओबियांग को 95 फीसदी मत मिले हैं।

लगातार छठवीं बार ओबियांग ने जीता चुनाव


वर्ष 2022 में ओबियांग ने लगातार छठवीं बार राष्ट्रपति का चुनाव जीता है। इक्वोटोरियल गिनी को जब से आजादी मिली है तब से अब तक केवल दो ही राष्ट्रपति हुए हैं। ओबियांग दूसरे और मौजूदा राष्ट्रपति हैं। पिछले 43 वर्षों से उनका देश पर शासन है। वह काफी सख्त मिजाज के माने जाते हैं। उनका अपने विरोधियों पर पूर्ण नियंत्रण है। उनकी अफ्रीकी देशों में भी काफी अच्छी पकड़ बताई जाती है। ओबियांग वर्ष 2011 से 2012 तक अफ्रीकी संघ के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

14 लाख है देश की आबादी

इक्वेटोरियल गिनी आबादी के लिहाज से बहुत छोटा देश है। यहां की कुल आबादी केवल 14 लाख है। बावजूद यहां के लोग गरीबी का जीवन जी रहे हैं। इस देश में लोगों की आय का कोई खास साधन नहीं है। वर्ष 1996 में यहां तेल का विशाल भंडार खोजा गया था। मगर उसका फायदा सिर्फ राजनीतिक लोगों को ही मिला। इससे उनकी आर्थिक तरक्की हुई, लेकिन जनता की हालत जस की तस है। यहां की जनता बदहाली की जिंदगी जी रही है। ओबियांग तानाशाह किस्म के बताये जाते हैं, उनका विरोध करने वालों को जेल में डाल दिया जाता है।

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चीन में क्‍यों लग रहे हैं ‘जिनपिंग गद्दी छोड़ो’ के नारे, क्‍या जाने वाली है सबसे ताकतवर नेता की कुर्सी!

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बीजिंग: बीजिंग, शंघाई, उरुमकी, नानजिंग, गुआनझोहू, वुहान और चीन के कम से कम एक दर्जन शहरों में इस समय जनता सड़कों पर उतरी हुई है। राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग अपने तीसरे कार्यकाल का सपना संजो चुके हैं और मार्च 2023 में उनका यह सपना पूरा हो जाएगा। लेकिन ये प्रदर्शन उनके लिए मुसीबत बन चुका है। कोविड-19 की वजह से देश में जो जीरो कोविड नीति लागू की गई है, उसे लेकर जनता का गुस्‍सा सांतवें आसमान पर पहुंच चुका है। जिनपिंग के खिलाफ नाराजगी सड़कों पर देखी जा सकती है। जनता ‘जिनपिंग गद्दी छोड़ो’ नारे लगा रही है। जिस कोविड को लेकर गुस्‍सा अमेरिका से लेकर ऑस्‍ट्रेलिया तक में नजर आ रहा था, वही अब चीन में भी नजर आने लगा है। कोविड केसेज भले ही कुछ कम हुए हों मगर इसके बाद भी लॉकडाउन की वजह से नाराजगी बढ़ती जा रही है।

वुहान में हालात मुश्किल
जिस वुहान से कोविड की शुरुआत हुई थी, वहां का नजारा जिनपिंग और उनके प्रशासन को चौंका सकता है। यहां पर प्रदर्शनकारी चिल्‍ला रहे हैं, ‘यह वुहान से शुरू हुआ था और यहीं पर खत्‍म होगा।’ नाराज जनता ने लोहे की बैरीकेडिंग तक को तोड़ दिया, कोविड टेस्‍ट कराने से मना कर दिया और यहां तक लॉकडाउन को खत्‍म करने की मांग तक कर डाली। दिसंबर 2019 में कोरोना वायरस का पहला केस वुहान में ही मिला था। यहां से यह पूरी दुनिया में पहुंचा और अब तक इसका असर देखा जा सकता है।

जीरो कोविड नीति की वजह से देश के बिजनेस ठप पड़े हैं और परिवारों को कई हफ्तों तक आइसोलेशन में रखा जा रहा है। इनका कहना है कि खाना भी सीमित मात्रा में मिल रहा है और दवाईयां भी ठीक से नहीं मिल रही हैं। पूरी दुनिया में जहां अब लोगों के लिए जीवन आसान हो रहा है तो वहीं चीन की जनता को कोविड के कारण कड़े प्रतिबंधों से गुजरना पड़ रहा है।

प्रदर्शनकारियों पर मिर्च का स्‍प्रे

सत्‍ताधारी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के खिलाफ जनता की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं। चीन के लोगों का मानना है कि जिनपिंग और उनकी सरकार को न तो लॉकडाउन के आर्थिक पहलू की चिंता और न ही उन्‍हें इसकी मानवीय कीमत का कोई अंदाजा है। शंघाई में तो पुलिस ने हद ही कर दी। यहां पर 300 लोगों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने काली मिर्च का स्‍प्ने तक यूज किया। यहां पर जनता नारे लगा रही थी, ‘जिनपिंग गद्दी छोड़ो, कम्‍युनिस्‍ट पार्टी गद्दी छोड़ो।’ इसके साथ ही लोग चिल्‍ला रहे थे, ‘शिनजियांग को अनलॉक करो, चीन को अनलॉक करो,’ ‘पीसीआर टेस्‍ट नहीं चाहिए, प्रेस की आजादी चाहिए।’
चीन में टूटा सब्र का बांध‍! कोरोना केस 30 हजार के पार लेकिन मंजूर नहीं लॉकडाउन, सड़कों पर भारी प्रदर्शन
जैसे-जैसे प्रदर्शनकारियों की भीड़ बढ़ती गई, पुलिस के साथ हिंसा भी बढ़ गई। उरुमकी से सामने आए एक व‍ीडियो में लोगों को कहते हुए सुना जा सकता है, ‘कम्‍युनिस्‍ट पार्टी को हटाओ, जिनपिंग को हटाओ।’ पिछले हफ्ते उरुमकी के एक अपार्टमेंट में आग लगने से 10 लोगों की मौत हो गई थी। इस अपार्टमेंट में आंशिक लॉकडाउन लगा था। यहां पर कड़े कोविड नियमों की वजह से राहत और बचाव कार्य मुश्किल हो रहा था। इस घटना के बाद से जनता काफी भड़क गई थी।

केसेज में तेजी से इजाफा
रविवार को चीन में 39791 केसेज आए हैं। यह लगातार चौथा दिन है जब कोविड के केसेज इतने बढ़े हैं। एक दिन पहले ही यानी शनिवार को 35,183 केसेज आए थे। चीन की राजधानी बीजिंग और कई बड़े शहरों में संक्रमण को रोकने के लिए कड़ी मशक्‍कत करनी पड़ रही है। बीजिंग में पिछले हफ्ते की तुलना में केसेज में 66 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। चीन में इतने बड़े स्‍तर पर विरोध प्रदर्शन आम बात नहीं है। कई नागरिक अब सोशल मीडिया में आकर अपना गुस्‍सा जता रहे हैं। सोशल मीडिया पर चीन ने सबसे ज्‍यादा प्रतिबंध लगाया हुआ है लेकिन अब इस प्‍लेटफॉर्म पर भी नियंत्रण करने में मुश्किल आ रही है।



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