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भविष्य की खोज के लिए जरूरी हुई अंतरिक्ष की सफाई, छोटे देशों की सफलता में रोड़ा बना कूड़ा, आखिर यहां कैसे फैल रही है गंदगी?

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Image Source : PIXABAY
space debris

Highlights

  • अंतरिक्ष का कचरा बन रहा बड़ी मुसीबत
  • सैटेलाइट के छोटे-छोटे टुकड़े फैल रहे
  • भविष्य के लिए इसका साफ होना जरूरी

Space Debris: पृथ्वी की परिक्रमा कर रहीं सैटेलाइट्स मानवता की बेहद जरूरी सेवाएं करती हैं। हम इंटरनेट के माध्यम से उनसे जुड़ते हैं, वे मैपिंग और जीपीएस में मदद करती हैं और वे जलवायु परिवर्तन पर नजर रखने के साथ साथ अन्य काम भी करती हैं। लेकिन ‘अंतरिक्ष में कचरा’ हमारी सैटेलाइट के उपयोग को खतरनाक भी बनाता है। सैटेलाइट के छोटे टुकड़े अंतरिक्ष में मलबा जमा कर रहे हैं। अंतरिक्ष से कचरा हटाने की जिम्मेदारी सामूहिक है और यह जलवायु परिवर्तन की तरह ही पर्यावरण की समस्या है। सैटेलाइट की मदद से जलवायु परिवर्तन का प्रबंधन किया जाता है, उसी तरह जलवायु परिवर्तन से सैटेलाइट के मलबे का प्रबंधन किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन की तरह अंतरिक्ष में कचरे की समस्या से केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही निपटा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के रूपरेखा समझौते पर 1992 में रियो पृथ्वी सम्मेलन में हस्ताक्षर किए गए थे। यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का पहला और सबसे जटिल कदम था। इस समझौते में ‘समान लेकिन विभिन्न जिम्मेदारियां’ (सीबीडीआर) नामक सिद्धांत शामिल है। यह कहता है कि देशों को वैश्विक पर्यावरण समस्याएं पैदा करने और इन समस्याओं से निपटने की क्षमताओं में ऐतिहासिक और मौजूदा योगदानों के अनुसार विभिन्न उपायों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।’

औद्योगिक देशों को लेनी होगी बड़ी जिम्मेदारी

दुनिया के देशों ने माना है कि औद्योगिक देशों की विकासशील अर्थव्यवस्था वाले देशों के मुकाबले जलवायु परिवर्तन में अधिक हिस्सेदारी रही है और इसलिए उन्हें इसके परिणामों से निपटने के लिए बड़ी जिम्मेदारी लेनी होगी। ‘पॉल्यूटर पेज’ नामक सिद्धांत के अनुसार किसी देश ने किस सीमा तक जलवायु परिवर्तन में योगदान दिया है और जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए उसकी कितनी क्षमताएं हैं, इस बात को संज्ञान में लिया जाता है। अंतरिक्ष में कचरा जमा होने से सभी अंतरिक्ष गतिविधियां प्रभावित होती हैं। उन राष्ट्रों की योजनाएं बेकार हो सकती हैं, जिनके पास अभी तक अंतरिक्ष गतिविधियों में शामिल होने के लिए संसाधन नहीं हैं।

विद्वानों ने अतीत से लेकर अब तक इस बात पर विचार किया है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और निर्णय प्रक्रिया में किस तरह समन्वय किया जाए। 

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Pervez Musharraf Assets: यूएई में ‘महल’, डॉलर से लेकर पौंड तक, जानिए कितने अमीर थे कंगाल पाकिस्‍तान के तानाशाह रहे परवेज मुशर्रफ

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पाकिस्‍तान (Pakistan) के पूर्व सेना प्रमुख और तानाशाह परवेज मुशर्रफ का दुबई में निधन (Pervez Musharraf Dead) हो गया है। मुशर्रफ को दुनिया उस तानाशाह के तौर पर जानती है जिसने सारी हदें पार कर दी थीं। वह यह बात भी दिलचस्‍प है कि जिस समय उनका देश पाई-पाई को मोहताज होने की तरफ बढ़ रहा था, वह खुद को अरबपति बनाने में लगे हुए थे।

 



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Pervez Musharraf Death News: तुमसे ना हो पाएगा कश्मीर पर कब्जा… जब पाकिस्तानी पत्रकार ने परवेज मुशर्रफ को हड़काया था

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पाकिस्तान के पूर्व सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ काम से ज्यादा बहसबाजी में विश्वास करते थे। उन्होंने एक बार दावा किया था कि अगर मंजूरी मिली तो वह तीन दिन में कश्मीर पर कब्जा कर सकते हैं। उनके इस दावे पर पाकिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए खूब खरीखोटी सुनाई थी।

 



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Pervez Musharraf Death: कारगिल के मास्‍टरमाइंड परवेज मुशर्रफ की वजह से पाकिस्‍तान पर भारत करने वाला था परमाणु हमला, आज गुमनामी में हो गया निधन

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इस्‍लामबाद: पाकिस्‍तान के तानाशाह रहे और पूर्व राष्‍ट्रपति परवेज मुशर्रफ का लंबी बीमारी के बाद दुबई में निधन हो गया। मुशर्रफ 79 साल के थे और पिछले काफी सालों से पाकिस्‍तान से बाहर रह रहे थे। मुशर्रफ वह शख्‍स थे जिनकी वजह से साल 1999 में भारत और प‍ाकिस्‍तान कारगिल की जंग में आमने सामने थे। मुशर्रफ उस समय पाकिस्‍तान आर्मी के चीफ थे और करीब एक साल से जंग की तैयारी में लगे हुए थे। कारगिल वह युद्ध था जिसकी वजह से पाकिस्‍तान पर परमाणु हमले का खतरा बढ़ गया था। अमेरिका के पूर्व राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन के करीबी और सीआईए के पूर्व अधिकारी ब्रूस रीडिल ने दावा किया था कि अगर अमेरिका बीच में नहीं आता और पाकिस्‍तान को ना समझाता तो भारत परमाणु हमला कर देता।

मुशर्रफ का एक आदेश और आतंकियों दाखिल
मुशर्रफ कारगिल की जंग के मास्‍टरमाइंड थे। मार्च 1999 से मई 1999 तक उन्‍होंने आतंकियों को कारगिल में घुसपैठ का आदेश दिया। पाकिस्‍तान की नॉर्दन लाइट इनफेंट्री ने कारगिल की कई चौंकियों पर कब्‍जा कर लिया था। ढाई महीने तक दोनों देशों की सेनाएं जंग कर रही थी। पाकिस्‍तानी सैनिकों और आतंकियों ने जबरन भारतीय चौकियों पर कब्‍जा कर लिया था। ऊंचाई पर लड़ी जा रहा युद्ध रोज नई चुनौतियां लेकर आता। इस युद्ध ने अमेरिका का रुख भारत के लिए बदलकर रख दिया और पाकिस्‍तान को जमकर घुड़की दी। पांच जुलाई 1999 का दिन अमेरिका को भी कभी नहीं भुलता है।

पाकिस्‍तान से भारत था नाराज
जंग के समय बिल क्लिंटन अमेरिका के राष्‍ट्रपति थे। ब्रुस रीडिल ने इस वाकये का ए‍क जिक्र वॉशिंगटन पोस्‍ट के आर्टिकल में किया था। रीडिल ने लिखा था कि भारत के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी काफी नाराज थे। वाजपेयी लगातार मांग कर रहे थे कि पाकिस्‍तान को अपनी सेनाओं को पीछे करना पड़ेगा। वाजपेयी की जिद के आगे तत्‍कालीन नाक पीएम नवाज ने हार मानी। रीडिल के मुताबिक भारत पूरी तरह से तैयार था कि वह पाकिस्‍तान पर परमाणु हमला कर देगा।

क्लिंटन ने दी वॉर्निंग
4 जुलाई 1999 को नवाज ने क्लिंटन से मुलाकात की। इसी मीटिंग में क्लिंटन ने नवाज को बताया कि वाजपेयी काफी नाराज हैं। क्लिंटन ने बताया कि वाजपेयी ने उनसे कहा है कि उन्‍हें मालूम है कि परमाणु हमले में भारत का भी 50 फीसदी हिस्‍सा खत्‍म हो जाएगा लेकिन पाकिस्‍तान का भी नामोनिशान मिट जाएगा। नवाज इस बात से काफी नाराज हुए। तीन जुलाई को शरीफ ने क्लिंटन से कहा कि वह मदद के लिए तुरंत वॉशिंगटन पहुंच रहे हैं। क्लिंटन ने भी उन्‍हें चेतावनी देते हुए कहा था कि वह तभी अमेरिका आएं तब सेनाओं की वापसी का फैसला लेने को तैयार हों।

एक-दूसरे पर दोष
क्लिंटन ने 4 जुलाई को शरीफ से बातचीत शुरू की और उन्‍हें शिकागो ट्रिब्‍यून का एक कार्टून पकड़ाया। इस कार्टून में पाकिस्‍तान और भारत को आपस में परमाणु बम से लड़ते हुए दिखाया गया था। अमेरिका और अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय के दबाव में पाकिस्‍तान को झुकना पड़ा। नवाज शरीफ को मजबूर होना पड़ा कि वह अपनी सेनाओं को वापस बुलाएं। 1999 में मुशर्रफ का प्‍लेन पाकिस्‍तान में लैंड करने ही वाला था कि नवाज ने उन्‍हें आर्मी चीफ के पद से हटा दिया। मुशर्रफ इस जंग के लिए नवाज को दोष देते रहे और नवाज इसे मुशर्रफ के दिमाग की खुराफात बताते रहे।



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