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दिवाली के अगले दिन दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर रहा कम, मगर सुरक्षित सीमा से ऊपर: सीपीसीबी 

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दिवाली के अगले दिन दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर रहा कम, मगर सुरक्षित सीमा से ऊपर: सीपीसीबी

इस बार 2015 के बाद से अपेक्षाकृत दिवाली सप्ताह रहा स्वच्छ, पटाखों ने दिल्ली की वायु गुणवत्ता को नहीं किया ज्यादा प्रभावित

जहां एक ओर हर साल दिवाली के बाद वायु प्रदूषण को ले कर चिंताएँ बढ़ती थीं, वहीं इस साल,बीते सालों के मुक़ाबले, देश की राजधानी में खतरनाक पीएम 2.5 के स्तर में कमी देखी गयी। हालांकि इसके स्तर में कमी ज़रूर दर्ज की गयी मगर यह फिर भी स्वीकार्य स्तर से अधिक ही थी। लेकिन जिस हिसाब से प्रदूषण एक भारी समस्या के रूप में हम पर मँडराता है, इस परिस्थिति को सकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए।  

हाल फिलहाल देखा जाता है किभारत में गंगा के मैदानों में दिवाली के बाद आसमान में धुंध आ जाती है और सांस लेने में तमाम मुश्किलें पेश आती है। इसका सीधे तौर पर दिवाली से कोई लेना देना नहीं लेकिन इस समय कई कारक एक साथ वायु की गुणवत्ता बिगाड़ने का काम करते हैं। इनमें पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना एक बड़ी वजह होता है। दिल्ली में सीपीसीबी के 33 मॉनिटरों के डेटा के विश्लेषण से पता चला है कि इस साल राजधानी में पीएम 2.5 का स्तर 2021 की तुलना में कम था, लेकिन यह 60 ug/m3 की दैनिक सुरक्षित सीमा से ऊपर बना रहा। चार मॉनिटरों का डेटा उपलब्ध नहीं था, इसलिए इन्हें विश्लेषण से बाहर रखा गया। शहर में पीएम 2.5 का उच्चतम स्तर 448.8 ug/m3 पूसा , दिल्ली में दर्ज किया गया । 

इस साल 25 अक्टूबर को सुबह 8 बजे वायु गुणवत्ता सूचकांक पिछले साल के इसी दिन और समय की तुलना में कुछ अधिक था। सीपीसीबी के अनुसार, दिवाली (24 अक्टूबर) की सुबह की तुलना में दीवाली की अगली सुबह (25 अक्टूबर) दिल्ली के सभी स्टेशनों के औसत एक्यूआई  में वृद्धि हुई। शहर का एक्यूआई 24 अक्टूबर को सुबह 8 बजे 301 था। यह 25 अक्टूबर को उसी समय 326 पहुँच गया था। पिछले साल 4 नवंबर, दिवाली के दिन, जहां दिल्ली के लिए एक्यूआई 320 था। वह 5 नवंबर, 2021 की सुबह 317 हुआ था।  

सिस्टम फॉर एयर क्वालिटी एंड वैदर फोरेकास्टिंग एंड रिसर्च (SAFAR) के अनुसार शहर में पीएम 10 और पीएम 2.5 की एकाग्रता सुबह 10 बजे के आसपास 257 ug/m3 और 150 ug/m3 थी। दोपहर करीब 1.30 बजे, यह बिगड़कर  क्रमश: 295 ug/m3 और 189 ug/m3 हो गया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, पीएम 10 और पीएम 2.5 के लिए दैनिक औसत सुरक्षित सीमा क्रमशः 100 ug/m3 और 60 ug/m3 है। 

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नहीं हुआ कोयला बिजली का वित्तपोषण, 2021 में मिली रिन्यूबल एनेर्जी को तरजीह 

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नहीं हुआ कोयला बिजली का वित्तपोषण, 2021 में मिली रिन्यूबल एनेर्जी को तरजीह 

साल 2021 में कोयले और रिन्यूबल स्त्रोतों से जुड़ी ऊर्जा परियोजनाओं की एक एनालिसिस से पता चलता है कि साल 2021 में कोयला बिजली परियोजनाओं के लिए कोई नया वित्तपोषण नहीं किया गया था। इतना ही नहीं, 2021 में नई ऊर्जा परियोजनाओं के लिए कुल वित्तपोषण, वित्‍त वर्ष 2017 के स्तर की तुलना में 60% कम था।  

क्‍लाइमेट ट्रेंड्स और सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबल (सीएफए) द्वारा लिखित कोल वर्सेज रीन्‍यूएबल फाइनेंशियल एनालीसिस को आईआईटी मद्रास द्वारा के सहयोग से आयोजित सीएफए की ऐनुअल एनर्जी फाइनेंस कांफ्रेस में आज जारी किया गया और इससे पता चलता है कि L&Tफाइनेंस ने साल 2021 में रिन्यूबल एनेर्जी के लिये सबसे बड़े वित्‍तपोषणकर्ता के तौर पर भारतीय स्‍टेट बैंक (एसबीआई) की जगह हासिल कर ली है।  

रिपोर्ट की मुख्‍य बातों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि:
· पहली बार, 2021 में चिह्नित किये गये परियोजना वित्त ऋण के मूल्य का 100% हिस्‍सा अक्षय ऊर्जा से सम्‍बन्धित परियोजनाओं के खाते में आया । यह वर्ष 2020 के मुकाबले खासी ज्‍यादा रहा, जब कुल कर्ज का 74 प्रतिशत हिस्‍सा अक्षय ऊर्जा के नाम रहा था।

· नयी ऊर्जा परियोजनाओं पर कुल वित्‍तपोषण में वर्ष 2017 के मुकाबले साल 2021 में 60 प्रतिशत की गिरावट आयी। इसके अलावा, जब मुद्रास्फीति को ध्यान में रखा जाता है, तो 2021 में नई ऊर्जा परियोजनाओं के लिए उधार दी गई राशि का वास्तविक मूल्य 2020 के स्तर की तुलना में कमी भी दर्शाता है।
· वर्ष 2021 में कोयले से जुड़ी परियोजनाओं के लिये मंजूर किये गये कर्ज को पिछली रिपोर्ट में शामिल किया गया था, लिहाजा उसे यहां सम्मिलित नहीं किया गया है। अगर इसे शामिल किया जाए तो इसका मतलब होगा कि कुल मूल्‍य का 20 प्रतिशत हिस्‍सा कोयले से चलने वाले बिजलीघरों और 80 फीसद हिस्‍सा अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के नाम रहा।

· यह दिलचस्‍प है कि इस साल सितम्‍बर के मध्‍य में केन्‍द्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने पीएफसी और आरईसी को एनेर्जी ट्रांज़िशन कार्यों के लिये विकास वित्‍तीय संस्‍थान (डीएफआई) का दर्जा देने की पेशकश की है। अगर इस प्रस्‍ताव को मान लिया गया तो सरकारी स्‍वामित्‍व वाले दोनों वित्‍तीय संस्‍थानों को देश में ऊर्जा रूपांतरण के लिये नोडल एजेंसी बनाया जा सकता है। कुछ अनुमानों के मुताबिक भारत को वर्ष 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्‍य हासिल करने के लिये 10 ट्रिलियन डॉलर की जरूरत
पड़ेगी और जरूरी वित्‍तपोषण हासिल करने में नोडल एजेंसी बहुत बड़ी भूमिका निभायेगी।
· भारतीय रिजर्व बैंक ने भी जलवायु जोखिम एवं सतत वित्‍त पर आधारित एक विमर्श पत्र साझा किया है, जिसमें इस सुझाव को बहुत मजबूती से सामने रखा गया है कि बैंक क्‍लाइमेट रिलेटेड फिनेंशियल डिसक्‍लोजर्स (टीसीएफडी) से सम्‍बन्धित टास्‍क फोर्स की बात मानें। साथ ही यह रिपोर्ट इस बात के लिये सुझाव पेश करती है कि निजी बैंक किस तरह से जलवायु परिवर्तन जोखिम से निपट सकते हैं और हरित वित्‍त के पैमाने को कैसे बढ़ा सकते हैं। भू-राजनीति के प्रभावों और पिछले कुछ वर्षों से बाजार टूटने के बावजूद इनमें से कुछ कदम अक्षय ऊर्जा के लिये जरूरी धन में वृद्धि कर सकते हैं, जिससे उन परियोजनाओं को जरूरी रफ्तार से आगे बढ़ाया जा सके।

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मीथेन कौन्सेंट्रेशन में हुई अब तक कीसबसे बड़ी वृद्धि 

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मीथेन कौन्सेंट्रेशन में हुई अब तक कीसबसे बड़ी वृद्धि 

एक बेहद चिंताजनक घटनाक्रम में, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO), की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 में तीन मुख्य ग्रीनहाउस गैसों – कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का वायुमंडलीय स्तर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। 

WMO के ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन ने 2021 में मीथेन कौन्सेंट्रेशन में साल-दर-साल की सबसे बड़ी छलांग की जानकारी दी। गैसों के वायुमंडलीय कौन्सेंट्रेशन की माप बीते चालीस सालों से हो रही है और यह उछाल बीते 40 साल में सबसे बड़ी है। इस असाधारण वृद्धि का कारण स्पष्ट नहीं है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह जैविक और मानव-प्रेरित दोनों प्रक्रियाओं का परिणाम है। 

साल 2020 से 2021 तक कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में वृद्धि पिछले दशक की औसत वार्षिक वृद्धि दर से अधिक थी। और अब, WMO के ग्लोबल एटमॉस्फियर वॉच नेटवर्क स्टेशनों के डाटा से पता चलता है कि 2022 में भी पूरे विश्व में इन स्तरों में वृद्धि जारी है। 

लंबे समय तक सक्रिय रहने वाली ग्रीनहाउस गैसों द्वारा हमारी जलवायु पर वार्मिंग प्रभाव, साल 1990 और 2021 के बीच, लगभग 50% बढ़ गया। इस वृद्धि का लगभग 80% कार्बन डाइऑक्साइड कि वजह से हुआ। 

2021 में कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता 415.7 भाग प्रति मिलियन (पीपीएम), मीथेन 1908 भाग प्रति बिलियन (पीपीबी) और नाइट्रस ऑक्साइड 334.5 पीपीबी थी। ये आंकड़े पूर्व-औद्योगिक स्तरों के सापेक्ष क्रमशः 149%, 262% और 124% हैं। 

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए डब्ल्यूएमओ के महासचिव प्रो. पेटेरी तालास ने कहा, “डब्लूएमओ के ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन ने एक बार फिर, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती और वैश्विक तापमान को और भी अधिक बढ़ने से रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई की भारी चुनौती – और महत्वपूर्ण आवश्यकता को रेखांकित किया है।” 

उन्होंने आगे कहा, “मीथेन के स्तर में रिकॉर्ड गति से बढ़त के साथ मुख्य गरम तापमान को ट्रेप करने वाली गैसों के कौन्सेंट्रेशन में निरंतर वृद्धि से पता चलता है कि हम गलत दिशा में जा रहे हैं।” 

समस्या का संधान बताते हुए वो कहते हैं, ” जीवाश्म ईंधन क्षेत्र में मीथेन उत्सर्जन से निपटने के लिए लागत प्रभावी रणनीतियां उपलब्ध हैं, और हमें बिना किसी देरी के इन्हें लागू करना चाहिए। हालांकि, मीथेन का जीवनकाल अपेक्षाकृत कम 10 साल से कम है और इसलिए जलवायु पर इसका प्रभाव पलटा जा सकता है। सर्वोच्च और सबसे जरूरी प्राथमिकता के रूप में, हमें कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करना होगा जो जलवायु परिवर्तन और संबंधित चरम मौसम के मुख्य चालक हैं, और जो ध्रुवीय बर्फ के नुकसान, समुद्र के गर्म होने और समुद्र के स्तर में वृद्धि के माध्यम से हजारों वर्षों तक जलवायु को प्रभावित करेगा।” 

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कॉप 27: कमज़ोर देशों के हितों के लिए हुआ एहम फैसला, नहीं हुई एमिशन पर रोक के लिए खास कार्यवाई

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कॉप 27: कमज़ोर देशों के हितों के लिए हुआ एहम फैसला, नहीं हुई एमिशन पर रोक के लिए खास कार्यवाई

संयुक्त राष्ट्र की 27वीं जलवायु वार्ता, या कॉप 27, आज मिस्र में समाप्त हुई। जहां एक ओर इस सम्मेलन में जलवायु संकट के सबसे कमजोर लोगों पर असर को कम करने पर अहम फैसले लिए गए, वहीं इस वार्ता में ग्लोबल वार्मिंग के कारणों को दूर करने के लिए कुछ खास देखने या सुनने को नहीं मिला।

इस कॉप में चर्चाओं के तराज़ू के एक पलड़े में अगर थी विकसित दुनिया की और अधिक मिटिगेशन महत्वाकांक्षा और जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार देशों की सूची का विस्तार तो दूसरे पलड़े में थी विकासशील देशों की बढ़ते जलवायु प्रभावों का सामना और उनसे निपटने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता की मांग। । इस कॉप में तमाम समझौते हुए मगर ग्लासगो में तय हुए एमिशन कटौती की आधार रेखा को बमुश्किल छूया जा सका।

इस कॉप में एक अकल्पनीय पहल ज़रूर हुई। और वो थी जलवायु संकट के प्रभाव के कारण होने वाले “नुकसान और क्षति” से निपटने के लिए, 2023 में अगले कॉप से पहले, दुनिया के सबसे कमजोर जनसमूहों के लिए वित्तीय सहायता संरचना स्थापित करने की प्रतिबद्धता। इसे अकल्पनीय इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि कुछ ही समय पहले इस पर मजबूती से चर्चाओं का दौर शुरू हुआ था और कॉप में इस पर फैसला भी ले लिया गया। ध्यान रहे कि जलवायु परिवर्तन के चलते हानी की कीमत बढ़ कर $200 बिलियन हो चुकी है।

एक चिंता की बात भी रही इस सम्मेलन में। इसमें भविष्य के ऊर्जा स्रोतों के रूप में रिन्यूबल के साथ “लो एमिशन या कम उत्सर्जन” वाले ऊर्जा स्ट्रोटोन पर चर्चा हुई। इससे डर इस बात का बंता है कि इस लो एमिशन जैसे अपरिभाषित शब्द की आड़ में नयी जीवाश्म ईंधन तकनीकों का विकास शुरू हो सकता है।

कॉप 27 पर टिप्पणी करते हुए, उल्का केलकर, निदेशक, जलवायु कार्यक्रम, डब्ल्यूआरआई इंडिया, ने कहा, “नया लॉस एंड डेमेज कोष गरीब और कमजोर देशों के नागरिक समाज समूहों के लिए एक तरह की सुरक्षा की गारंटी है। एक और बढ़िया बात रही बहुपक्षीय विकास बैंकों को साफ संदेश दिया गया कि वह विकासशील देशों को कर्ज में डूबने के लिए मजबूर किए बिना उन्हें अधिक जलवायु वित्त प्रदान करें। COP27 एक नया न्यायसंगत एनेर्जी ट्रांज़िशन कार्यक्रम भी बना है जो भारत जैसे देशों के लिए प्रासंगिक है जिनके पास जीवाश्म ईंधन पर निर्भर क्षेत्रों में बड़े कार्यबल लगे हैं।”

जिस तरह G20 का अंत युद्ध के खिलाफ एक मजबूत बयान के साथ हुआ, वैसे ही COP27 से अंत में सभी जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए वर्तमान ऊर्जा संकट में एक शक्तिशाली प्रतिबद्धता दिखाई जा सकती थी। मगर इसके बजाय, यह केवल एक विविध ऊर्जा मिश्रण का आह्वान करता है, जो कि एक लिहाज से गैस के निरंतर विस्तार को बढ़ावा देता है।

आगे, IISD की वरिष्ठ नीति सलाहकार, श्रुति शर्मा कहती हैं, “यह निराशाजनक है कि COP27 ने COP26 के फैसलों पर आगे खास कदम नहीं बढ़ाए। ऐसा न होने से जीवाश्म ईंधन के फेजआउट पर एक मजबूत संदेश नहीं दिया जा सका। कॉप 26 ने अन्य बातों के साथ-साथ, कोयले के बेरोकटोक फेजडाउन के माध्यम से कम ऊर्जा प्रणालियों कि ओर बढ्ने के लिए पार्टियों से कहा था। भारत के प्रस्ताव के माध्यम से COP27 में उम्मीद थी कि कोयले के तेल और गैस सहित सभी जीवाश्म ईंधनों को धीरे-धीरे समाप्त किया जाए। मगर भारतीय प्रस्ताव के इरादे के बावजूद, हम जानते हैं कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों के साथ चलने और 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान सीमा को पहुंच के भीतर रखने के लिए अब भारी उत्सर्जन में कटौती की आवश्यकता है। इसका मतलब है कि हमें तत्काल (1) कोई नया जीवाश्म ईंधन निवेश नहीं करने की प्रतिबद्धता की आवश्यकता है; (2) कोयले, तेल और गैस के वैश्विक उत्पादन और खपत में कमी के लिए ठोस योजनाएँ, और (3) इन सभी जीवाश्म ईंधनों के लिए सरकारी समर्थन को खत्म करने के लिए फैसले लेने होंगे।”

दुनिया पहले चरण में कोयले को कम करने और उसके बाद तेल और गैस की ओर मुड़ने का जोखिम नहीं उठा सकती है। इस इस वर्ष के कॉप में जीवाश्म ईंधन से दूरी पर खास ज़ोर नहीं दिखा और यह निराशाजनक बात है।

अंत में क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक, आरती खोसला ने निष्कर्ष निकाला, “COP27 निगलने के लिए एक कठिन गोली कि तरह रही है, लेकिन अंत में अनुमान से अधिक प्रगति भी हुई है। यह दर्शाता है कि सभी देश अभी भी इस प्रक्रिया में शामिल होने के इच्छुक हैं और इसका महत्व समझ रही हैं। वार्ताकारों ने भाषा पर बहस की है लेकिन बड़ी तस्वीर में दुनिया ने 1.5 डिग्री तापमान वृद्धि पर भाषा से समझौता न करके एक साल बर्बाद होने से बचा लिया है। इस कॉप को नुकसान और क्षति कोष बनाने के समझौते के लिए याद किया जाएगा। कॉप ने प्रदर्शित किया है कि कैसे भू-राजनीति बदल रही है और प्रत्येक देश ने अपने हितों में काम किया है। नवीनीकरण के पैमाने को शामिल करने में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। देश सभी जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध तरीके से कम करने पर सहमत होने से चूक गए। यह न सिर्फ ऊर्जा संकट पर प्रकाश डालता है बल्कि इस कॉप में और तेल और गैस लॉबी की पकड़ के बारे में भी बताता है।”

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