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दवाओं का पेटेंट नहीं तो मूल्य निर्धारण जरूरी

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सोहिनी दास /  11 22, 2022






केंद्र सरकार और फार्मा उद्योग उन दवाओं के लिए मूल्य निर्धारण तंत्र पर काम कर रहे हैं, जिनका पेटेंट नहीं हो रहा है। यह कदम प्रमुख मधुमेह दवाओं के हाल ही में पेटेंट की समाप्ति की पृष्ठभूमि को देखते हुए महत्त्वपूर्ण है। उद्योग जगत के कई सूत्रों ने बताया कि पिछले शुक्रवार को उद्योग के प्रतिनिधियों और फार्मास्युटिकल विभाग के बीच हितधारकों की बैठक हुई थी। उन्होंने कार्यों में मूल्य निर्धारण तंत्र का विवरण साझा किया। 

उद्योग जगत से जुड़े एक सूत्र ने कहा कि अभी इस विषय पर अंतिम निर्णय निर्णय होना बाकी है, लेकिन मूल्य निर्धारण तंत्र के तहत प्रवर्तक मूल्य के 50 फीसदी पर पेटेंट समाप्त होने वाली दवाओं के लिए एक उच्चतम कीमत निर्धारित करने की संभावना है। सूत्र ने समझाया कि यदि कोई ऐसी दवा हैं जो पेटेंट किए गए अणु के साथ संयोजन में कीमत नियंत्रण के अधीन है, तो उस पर अधिकतम कीमत जो ली जा सकती है वह मौजूदा उच्चतम कीमत से 20 फीसदी कम है। 

उदाहरण के लिए यदि बाजार में सिटाग्लिप्टिन (मधुमेह-रोधी पेटेंटयुक्त अणु, जिसका पेटेंट इसी साल समाप्त हुआ है) और मेटफॉर्मिन (मधुमेह की एक अन्य सामान्य दवा जो पहले से ही मूल्य नियंत्रण में है) का संयोजन बाजार में बिक रहा है, तो उसकी अधिकतम कीमत सिटाग्लिप्टिन की प्रवर्तक कीमत की 50 फीसदी निर्धारित की गई है। 

मामले की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने कहा कि एक बार उच्चतम कीमत निर्धारित हो जाने के बाद इसकी समीक्षा एक साल के बाद की जाएगी, जब तक और अधिक ब्रांड बाजार में आ जाएंगे। फिर नियामक बाजार में उतरने वाले नए ब्रांडों की कीमतों के रुझान की समीक्षा करेगा और फिर से नई उच्चतम कीमत तय करेगा। उन्होंने कहा कि इससे उपभोक्ता और निर्माताओं दोनों के लिए अधिक अनुमानित मूल्य निर्धारण व्यवस्था तैयार होगी। 

सूत्र ने कहा, ‘मधुमेह की प्रमुख दवा सिटाग्लिप्टिन का पेटेंट समाप्त होने के बाद इसकी कीमतों में 35 फीसदी और उससे अधिक की कमी की गई है। बाजार की प्रतिस्पर्धा कीमतों को नियंत्रण में रख रही है। लेकिन प्रस्ताव दवा निर्माताओं और उपभोक्ता के लिए अधिक अनुमानित मूल्य निर्धारण वातावरण बनाने का है। 

राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल कीमत निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने जुलाई में मधुमेह-रोधी श्रेणी में पेटेंट समाप्त होने वाली नवीनतम दवा सिटाग्लिप्टिन की कीमतों को सीमित करने के लिए तेजी से कदम बढ़ाया है। इसने अगस्त में इन दोनों दवाओं की कीमतों को 16-25 रुपये प्रति टैबलेट के दायरे में सीमित कर दिया। 

शोध और विश्लेषण फर्म एडब्ल्यूएसीएस की अध्यक्ष (विपणन) शीतल सपले ने अगस्त में बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया था कि इस अणु के पेटेंट के खत्म होने के एक महीने के भीतर 5 फीसदी सिटाग्लिप्टिन बाजार पर जेनेरिक ब्रांडों का कब्जा है।

85 जेनेरिक ब्रांडों के साथ लगभग 27 खिलाड़ियों ने बाजार में कदम रखा है और अगले कुछ महीनों में 100 सिटाग्लिप्टिन और इसके संयोजन ब्रांडों के साथ लगभग 50 खिलाड़ियों के भारतीय बाजार में आने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि कीमतों में गिरावट आई है, जबकि सिटाग्लिप्टिन की कीमत 36-45 रुपये प्रति टैबलेट थी और जेनेरिक ब्रांडों की कीमत  7-15 प्रति टैबलेट के दायरे में थी। एक मूल्य निर्धारण तंत्र तैयार करने की आवश्यकता है क्योंकि कई रोगी जो खर्च कर सकते हैं, वे नवप्रवर्तक ब्रांड के साथ रहना पसंद कर सकते हैं। पेटेंट समाप्त होने से बाजार में नई दवाइयां भी आती है। 



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यूपी में होगा ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन

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उत्तर प्रदेश में हरित एवं स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिक क्लस्टर बनाकर ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन किया जाएगा। प्रदेश में ग्रीन वैली की स्थापना कर ग्रीन हाइड्रोजन व अमोनिया के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। प्रदेश सरकार ने ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक नीति का मसौदा तैयार किया है। प्रस्तावित नीति के तहत हाइड्रोजन व अमोनिया जैसी गैसों का उत्पादन करने वाले निवेशकों को कई तरह की सहूलियतें व छूट दी जाएंगी।

अगले साल फरवरी में होने वाले वैश्विक निवेशक सम्मेलन से पहले योगी सरकार ग्रीन हाइड्रोजन नीति लागू कर निवेश के नए दरवाजे खोलेगी। प्रदेश सरकार का उद्देश्य 2028 तक खाद कारखानों व तेल शोधन संयंत्रों में कुल हाइड्रोजन के उपभोग का 20 फीसदी ग्रीन हाइड्रोजन के इस्तेमाल का है। इसे 2035 तक बढ़ाकर 100 फीसदी कर दिया जाएगा।

इसके चलते प्रस्तावित ग्रीन हाइड्रोजन नीति में पूंजीगत व्यय में इलेक्ट्रोलाइजर के विकास पर 2023 में 60 फीसदी, 2024 में 55 फीसदी व 2025 में 45 फीसदी की सब्सिडी देने की योजना है। ग्रीन हाइड्रोजन के निर्माण में इलेक्ट्रोलाइजर सबसे अहम घटक है।

प्रस्तावित नीति के मुताबिक ग्रीन हाइड्रोजन व अमोनिया के परिवहन और स्टोरेज क्षमता को भी विकसित किया जाएगा। प्रदेश सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि जल्दी ही मंत्रिपरिषद की बैठक में प्रस्तावित ग्रीन हाइड्रोजन नीति को मंजूरी दी जाएगी। प्रस्तावित नीति के मुताबिक ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में शोध, अनुसंधान और तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देने के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जाएगा। 

ग्रीन हाइड्रोजन व अमोनिया का उत्पादन करने वाले निवेशकों को 15 दिन के भीतर सिंगल विंडो पोर्टल के जरिए जरूरी मंजूरी दी जाएगी। तकनीक को बढ़ावा देने के लिए 30 फीसदी या 5 करोड़ रुपये तक की सब्सिडी दी जाएगी। ग्रीन हाइड्रोजन व अमोनिया का उत्पादन संयंत्र लगाने वाले निवेशकों को स्टांप शुल्क एवं भूउपयोग शुल्क में सौ फीसदी की छूट दी जाएगी जबकि पानी के इस्तेमाल पर लगने वाले शुल्क में 50 फीसदी की छूट दी जाएगी।



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क्रेडिट कार्ड से खर्च 1.29 लाख करोड़

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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि त्योहारी सीजन के दौरान क्रेडिट कार्ड के खर्च ने अक्टूबर में वृद्धि की गति को जारी रखा और 1.29 लाख करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर को छू लिया। यह पिछले महीने की तुलना में 5.5 फीसदी अधिक है, तब कुल खर्च 1.22 लाख करोड़ रुपये था। 

उच्च आधार के बावजूद पिछले साल की समान अवधि की तुलना में खर्च 25 फीसदी ज्यादा रहा। पिछले साल अक्टूबर में त्योहारी सीजन के कारण क्रेडिट का खर्च पहली बार 1 लाख करोड़ रुपये पहुंचा था। साथ ही एक साल से निष्क्रिय कार्डों को निरस्त करने के रिजर्व बैंक के नियम के बाद पिछले दो माह में क्रेडिट कार्ड संख्या में शुद्ध कमी आई। बैंकिंग व्यवस्था में 16.6 लाख से अधिक क्रेडिट कार्ड जोड़े गए, जिसके बाद कुल कार्डों की संख्या 7.93 करोड़ हो गई। 

आरबीआई के नए मानदंड के लागू होने से पहले उद्योग एक महीने में औसतन 15 लाख से अधिक क्रेडिट कार्ड जोड़ रहा था, क्योंकि महामारी में बैंकों ने असुरक्षित ऋण देने का कारोबार तेज कर दिया था। अक्टूबर के दौरान सबसे अधिक एसबीआई कार्ड्स और भुगतान सेवाओं ने 3,39,160 कार्ड जोड़े। इसके बाद ऐक्सिस बैंक ने 2,61,367 कार्ड्स और आईसीआईसीआई बैंक ने 2,21,280 कार्ड्स जोड़े। देश के सबसे बड़े क्रेडिट कार्ड जारीकर्ता एचडीएफसी बैंक ने इस अवधि के दौरान 2,17,979 कार्ड जोड़े। 

जुलाई-सितंबर (दूसरी तिमाही) तिमाही में कार्ड की संख्या में 25.5 लाख की गिरावट आई। प्रमुख जारीकर्ताओं में देश के सबसे बड़े कार्ड जारीकर्ता एचडीएफसी बैंक के क्रेडिट कार्डों की संख्या में वित्त वर्ष 23 की दूसरी तिमाही में 16.2 लाख की शुद्ध गिरावट आई। ई-कॉमर्स लेन-देन की बढ़ती हिस्सेदारी के कारण पिछले आठ महीनों में कार्ड खर्च लगातार 1 लाख करोड़ रुपये के ऊपर रहा है। महामारी में कम हुए यात्रा और आतिथ्य खर्च मजबूती से वापस आ गए हैं।



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4.5 गीगावॉट बिजली आपूर्ति के लिए बोली आमंत्रित

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देश के सभी इलाकों में अगले साल खासकर ज्यादा मांग वाले गर्मी के महीनों में बिजली की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के वास्ते  केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने 4.5 गीगावॉट बिजली खरीदने के लिए बिजली उत्पादन कंपनियों (जेनको) से बोली आमंत्रित की है। आपूर्ति की अवधि 5 साल होगी। साथ ही इस योजना में पात्र पाई जाने वाली उत्पादन कंपनियों को अतिरिक्त कोयले का आवंटन किया जाएगा। 

बिजली मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, ‘ पीएफसी कंसल्टिंग लिमिटेड (पीएफसी लिमिटेड की पूर्ण मालिकाना वाली सहायक इकाई) को बिजली मंत्रालय की नोडल एजेंसी बनाया गया है। योजना के तहत पीएपसी कंसल्टिंग लिमिटेड ने 4,500 मेगावाट बिजली की आपूर्ति के लिए बोली आमंत्रित की है। बिजली की आपूर्ति अप्रैल 2023 से शुरू होगी। कोयला मंत्रालय से अनुरोध किया गया है कि वह सालाना करीब 2.7 करोड़ टन कोयले का आवंटन करे।’ 

यह बोली शक्ति योजना के तहत आमंत्रित की गई है, जिसे केंद्र ने 2017 में शुरू किया था, जिससे देश भर में बिजली की भरपूर आपूर्ति के लिए कोयला लिंकेज सुनिश्चित किया जा सके। बिजली मंत्रालय ने वित्त, स्वामित्व और संचालन (एफओओ) के आधार पर शक्ति (भारत में पारदर्शी रूप से कोयले के उपयोग और आवंटन की योजना) नीति के तहत बोली आमंत्रित की है। इसमें यह भी कहा गया है कि राज्यों के समूह भी बिजली की जरूरतों के मुताबिक किसी एजेंसी के माध्यम से बिजली की खरीद कर सकेंगे। बोली जमा करने की अंतिम तिथि 21 दिसंबर 2022  तक है।



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