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चिप निर्माण की चुनौती से निपटने की तैयारी करे भारत

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प्रसेनजित दत्ता /  11 18, 2022






चीन को अत्याधुनिक चिप की आपूर्ति में अमेरिका ने प्रतिबंध लगाकर जो अवरोध उत्पन्न किए हैं, उन्हें देखते हुए इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में भारत को तेजी से अपनी क्षमताएं बढ़ाने का सुझाव दे रहे हैं प्रसेनजित दत्ता 

इं  टीग्रेटेड सर्किट या ‘सिलिकन चिप’   से जुड़ी लड़ाई एक नए दौर में दाखिल  हो गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन की एक हालिया घोषणा ने इस युद्ध का ताजा बिगुल बजाने का काम किया है। अमेरिका प्रशासन ने चीन को अत्याधुनिक चिप की आपूर्ति पर प्रतिबंध लगा दिया है। दरअसल, चीन के पास अभी ऐसी चिप को डिजाइन करने और उनके विनिर्माण की क्षमताओं का अभाव है। 

ये प्रतिबंध बड़े व्यापक हैं, जो न केवल चीन को नई पीढ़ी की चिप की बिक्री पर प्रतिबंध लगाते हैं, बल्कि अमेरिकी कंपनियों और अमेरिकी तकनीक पर निर्भर इकाइयों को उन लाइसेंसिंग सॉफ्टवेयर, उपकरण एवं तकनीकों की चीन को बिक्री करने पर भी प्रतिबंधित करते हैं, जो चिप निर्माण के लक्ष्य पूर्ति में चीन के लिए आवश्यक हैं। इसके अतिरिक्त, ये अमेरिकी नागरिकों और यहां तक कि ग्रीन कार्ड धारकों को भी तकनीक से जुड़ी किसी चीनी कंपनी के लिए या उसके साथ काम करने को लेकर भी रोकने वाले हैं। 

इन प्रतिबंधों का दायरा अमेरिकी सहयोगियों और उनकी कंपनियों पर भी लागू होता है, यह देखते हुए कि वे किसी न किसी तरह से अमेरिकी तकनीक पर ही निर्भर हैं। इससे ताइवान की टीएसएमसी या दक्षिण कोरिया की सैमसंग के लिए चीन को अत्याधुनिक चिप की बिक्री करना या फिर उसकी इस क्षेत्र में मदद करना तक मुश्किल हो जाएगा। चीन हमेशा से टीएसएमसी और सैमसंग का बड़ा ग्राहक रहा है। 

यह घटनाक्रम चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के लिए बड़ा झटका है, जिन्होंने ऐसी योजना तैयार की थी, जिसमें चीन के लिए तमाम तकनीकों में अमेरिका को पछाड़ने और पश्चिम पर महत्त्वपूर्ण बढ़त बनाने की संकल्पना की गई थी। नई पीढ़ी की चिप तक पहुंच के बिना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के साथ-साथ 5जी और ब्लॉकचेन में चीनी महत्त्वाकांक्षाओं को बड़ा झटका लगेगा। 

ऐसा कतई नहीं है कि चीन को ऐसी परिस्थितियों का कोई आभास नहीं था, लेकिन संभवतः उसने यही सोचा होगा कि एकाएक ऐसे हालात नहीं बनेंगे और इस क्षेत्र में अपनी क्षमताएं विकसित करने की तैयारी में उसे कुछ वर्षों का समय और मिल जाएगा। यही कारण है कि चीन ने संबंधित तकनीकी शोध के लिए भारी मात्रा में वित्तीय संसाधन झोंके हैं, ताकि पश्चिम और टीएसएमसी या सैमसंग पर अपनी निर्भरता को घटाया जाए, जो अत्याधुनिक चिप निर्माण में अग्रणी हैं। 

फिलहाल 3-एनएम (नैनोमीटर) प्रोसेसर सबसे अत्याधुनिक और शक्तिशाली चिप हैं। टीएसएमसी ने इसके निर्माण में महारत हासिल की है और वही इस मोर्चे पर अग्रणी है। वहीं सैमसंग और इन्टेल भी अपनी क्षमताएं विकसित कर रही हैं। ये तीनों कंपनियां अब 2-एनएम चिप पर काम कर रही हैं। इसके उलट, चीनी चिप निर्माण क्षमताएं अभी कई पीढ़ी पीछे हैं। यहां तक कि चीन की सबसे प्रमुख चिप निर्माण कंपनी एसएमआईसी अभी तक 7-एनएम चिप बनाने में सफल हो पाई है, जबकि अन्य कंपनियां तो उससे भी गई-गुजरी और पुरानी चिप ही बना पा रही हैं। कुल मिलाकर कहानी यही है कि भले ही चीनी कंपनियां लंबे समय से चिप निर्माण के प्रयासों में लगी हैं, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी ही अभी भी इस मोर्चे पर बढ़त बनाए हुए हैं। 

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह चीन को चिप में स्थायी रूप से पिछड़ा बना देगा या फिर वह बराबरी कर सकता है? चीन की अधिकांश तकनीकी क्षमताओं का निर्माण उन लोगों ने किया है, जो स्वदेश में उनकी स्थापना और विकास से पहले पढ़ने के लिए अमेरिका गए और वहां बेहतरीन इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला लिया और दिग्गज अमेरिकी या पश्चिमी तकनीकी कंपनियों में कार्य करते हुए अनुभव अर्जित किया। उनमें से अधिकांश उद्यमी जन्म से तो चीनी हैं, लेकिन तबसे उन्होंने अमेरिकी नागरिकता प्राप्त कर ली है।

अमेरिकी प्रशासन के प्रतिबंधों के कारण उन्हें अब कोई एक पक्ष चुनने पर बाध्य होना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, चीनी तकनीकी कंपनियों में तमाम इंजीनियर महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में अमेरिकी नागरिकों या ग्रीन कार्ड्स पर निर्भर हैं। वहीं यह भी जगजाहिर है कि तकनीकी क्षेत्र में चीन की अधिकांश वर्तमान क्षमताएं पश्चिमी डिजाइन और तकनीकों की नकल पर ही आधारित हैं। 

चीन ने कुछ समय से अपने विश्वविद्यालयों और प्रौद्योगिकी संस्थानों में तकनीकी शोध-अनुसंधान को तेजी से बढ़ावा दिया है, लेकिन कई क्षेत्रों में वह अमेरिकी और यूरोपीय शोध-अनुसंधान से पीछे है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि चीन इस मोर्चे पर बराबरी नहीं कर सकता। असल में मौजूदा प्रतिबंधों से उसके लिए यह कवायद जरा कठिन हो जाएगी और उसमें समय भी ज्यादा लगेगा। 

अधिकांश यूरोपीय देशों और ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ जापान और कोरिया व्यापक रूप से अमेरिका का समर्थन कर रहे हैं। हालांकि वे अपनी क्षमताओं को भी विकसित करने में लगे हैं। जापान और तमाम यूरोपीय देश, जो चिप फैब्रिकेशन के लिए ताइवान पर निर्भर रहे हैं, अब अपनी क्षमताओं को धार देने में लगे हैं, ताकि अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ताइवान पर निर्भरता घटाई जा सके। 

जहां तक भारत की बात है तो एक बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद वह इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में बहुत पिछड़ा हुआ है। हम इस दिशा में छोटे-छोटे कदम उठा रहे हैं। अभी तक वेदांत-फॉक्सकॉन साझेदारी में चिप निर्माण की योजना ही सामने आई है, जिसमें अभी उतनी उन्नत चिप नहीं बनाई जाएगी। हालिया रिपोर्टों के अनुसार चिप निर्माण में हमारी यात्रा 28-एनएम चिपसेट्स से शुरू होगी। न ही हम शीर्ष वैश्विक चिप कंपनियों में से किसी को देश में बिक्री के लिए लाने में सफल हो पाए हैं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घरेलू चिप क्षमताओं को प्राथमिकता बनाया है। सरकार ने इस दिशा में कई कदम भी उठाए हैं। इसमें उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) से लेकर भारत में संयंत्र स्थापना में सहायता और विदेश से 28-एनएम फैब्रिकेशन तकनीक के लाइसेंस जैसी पहल शामिल हैं। ये निश्चित रूप से बढ़िया कदम हैं, लेकिन भारत की आकांक्षाओं को देखते हुए पर्याप्त नहीं होंगे। देश के लिए अगला कदम यही होना चाहिए कि वह चिप वैल्यू चेन की दिशा में देखे।

इसके लिए या तो उन्हें पूरी तरह से खरीद लिया जाए या स्वतंत्र चिप डिजाइन में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी हासिल की जाए। बिक्री के लिए उपलब्ध दुनिया भर की फाउंड्री फर्म्स पर भी दांव लगाया जा सकता है। परंतु इसके लिए निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी आवश्यक होगी। अभी तक तो भारत के सबसे बड़े कारोबारी चिप-निर्माण के बजाय हरित ऊर्जा क्षमता विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। जब तक कि सरकार उन्हें चिप निर्माण के मोर्चे पर बड़ा दांव लगाने को लेकर रजामंद कर इस दिशा में उन्मुख नहीं करती, तब तक कोई आसार नहीं कि इस मामले में हमारी कमजोरी दूर हो पाएगी। 

(लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और संपादकीय परामर्श संस्था प्रोजैक व्यू के संस्थापक हैं)



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यूपी में होगा ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन

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उत्तर प्रदेश में हरित एवं स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिक क्लस्टर बनाकर ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन किया जाएगा। प्रदेश में ग्रीन वैली की स्थापना कर ग्रीन हाइड्रोजन व अमोनिया के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। प्रदेश सरकार ने ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक नीति का मसौदा तैयार किया है। प्रस्तावित नीति के तहत हाइड्रोजन व अमोनिया जैसी गैसों का उत्पादन करने वाले निवेशकों को कई तरह की सहूलियतें व छूट दी जाएंगी।

अगले साल फरवरी में होने वाले वैश्विक निवेशक सम्मेलन से पहले योगी सरकार ग्रीन हाइड्रोजन नीति लागू कर निवेश के नए दरवाजे खोलेगी। प्रदेश सरकार का उद्देश्य 2028 तक खाद कारखानों व तेल शोधन संयंत्रों में कुल हाइड्रोजन के उपभोग का 20 फीसदी ग्रीन हाइड्रोजन के इस्तेमाल का है। इसे 2035 तक बढ़ाकर 100 फीसदी कर दिया जाएगा।

इसके चलते प्रस्तावित ग्रीन हाइड्रोजन नीति में पूंजीगत व्यय में इलेक्ट्रोलाइजर के विकास पर 2023 में 60 फीसदी, 2024 में 55 फीसदी व 2025 में 45 फीसदी की सब्सिडी देने की योजना है। ग्रीन हाइड्रोजन के निर्माण में इलेक्ट्रोलाइजर सबसे अहम घटक है।

प्रस्तावित नीति के मुताबिक ग्रीन हाइड्रोजन व अमोनिया के परिवहन और स्टोरेज क्षमता को भी विकसित किया जाएगा। प्रदेश सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि जल्दी ही मंत्रिपरिषद की बैठक में प्रस्तावित ग्रीन हाइड्रोजन नीति को मंजूरी दी जाएगी। प्रस्तावित नीति के मुताबिक ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में शोध, अनुसंधान और तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देने के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जाएगा। 

ग्रीन हाइड्रोजन व अमोनिया का उत्पादन करने वाले निवेशकों को 15 दिन के भीतर सिंगल विंडो पोर्टल के जरिए जरूरी मंजूरी दी जाएगी। तकनीक को बढ़ावा देने के लिए 30 फीसदी या 5 करोड़ रुपये तक की सब्सिडी दी जाएगी। ग्रीन हाइड्रोजन व अमोनिया का उत्पादन संयंत्र लगाने वाले निवेशकों को स्टांप शुल्क एवं भूउपयोग शुल्क में सौ फीसदी की छूट दी जाएगी जबकि पानी के इस्तेमाल पर लगने वाले शुल्क में 50 फीसदी की छूट दी जाएगी।



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क्रेडिट कार्ड से खर्च 1.29 लाख करोड़

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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि त्योहारी सीजन के दौरान क्रेडिट कार्ड के खर्च ने अक्टूबर में वृद्धि की गति को जारी रखा और 1.29 लाख करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर को छू लिया। यह पिछले महीने की तुलना में 5.5 फीसदी अधिक है, तब कुल खर्च 1.22 लाख करोड़ रुपये था। 

उच्च आधार के बावजूद पिछले साल की समान अवधि की तुलना में खर्च 25 फीसदी ज्यादा रहा। पिछले साल अक्टूबर में त्योहारी सीजन के कारण क्रेडिट का खर्च पहली बार 1 लाख करोड़ रुपये पहुंचा था। साथ ही एक साल से निष्क्रिय कार्डों को निरस्त करने के रिजर्व बैंक के नियम के बाद पिछले दो माह में क्रेडिट कार्ड संख्या में शुद्ध कमी आई। बैंकिंग व्यवस्था में 16.6 लाख से अधिक क्रेडिट कार्ड जोड़े गए, जिसके बाद कुल कार्डों की संख्या 7.93 करोड़ हो गई। 

आरबीआई के नए मानदंड के लागू होने से पहले उद्योग एक महीने में औसतन 15 लाख से अधिक क्रेडिट कार्ड जोड़ रहा था, क्योंकि महामारी में बैंकों ने असुरक्षित ऋण देने का कारोबार तेज कर दिया था। अक्टूबर के दौरान सबसे अधिक एसबीआई कार्ड्स और भुगतान सेवाओं ने 3,39,160 कार्ड जोड़े। इसके बाद ऐक्सिस बैंक ने 2,61,367 कार्ड्स और आईसीआईसीआई बैंक ने 2,21,280 कार्ड्स जोड़े। देश के सबसे बड़े क्रेडिट कार्ड जारीकर्ता एचडीएफसी बैंक ने इस अवधि के दौरान 2,17,979 कार्ड जोड़े। 

जुलाई-सितंबर (दूसरी तिमाही) तिमाही में कार्ड की संख्या में 25.5 लाख की गिरावट आई। प्रमुख जारीकर्ताओं में देश के सबसे बड़े कार्ड जारीकर्ता एचडीएफसी बैंक के क्रेडिट कार्डों की संख्या में वित्त वर्ष 23 की दूसरी तिमाही में 16.2 लाख की शुद्ध गिरावट आई। ई-कॉमर्स लेन-देन की बढ़ती हिस्सेदारी के कारण पिछले आठ महीनों में कार्ड खर्च लगातार 1 लाख करोड़ रुपये के ऊपर रहा है। महामारी में कम हुए यात्रा और आतिथ्य खर्च मजबूती से वापस आ गए हैं।



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4.5 गीगावॉट बिजली आपूर्ति के लिए बोली आमंत्रित

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देश के सभी इलाकों में अगले साल खासकर ज्यादा मांग वाले गर्मी के महीनों में बिजली की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के वास्ते  केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने 4.5 गीगावॉट बिजली खरीदने के लिए बिजली उत्पादन कंपनियों (जेनको) से बोली आमंत्रित की है। आपूर्ति की अवधि 5 साल होगी। साथ ही इस योजना में पात्र पाई जाने वाली उत्पादन कंपनियों को अतिरिक्त कोयले का आवंटन किया जाएगा। 

बिजली मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, ‘ पीएफसी कंसल्टिंग लिमिटेड (पीएफसी लिमिटेड की पूर्ण मालिकाना वाली सहायक इकाई) को बिजली मंत्रालय की नोडल एजेंसी बनाया गया है। योजना के तहत पीएपसी कंसल्टिंग लिमिटेड ने 4,500 मेगावाट बिजली की आपूर्ति के लिए बोली आमंत्रित की है। बिजली की आपूर्ति अप्रैल 2023 से शुरू होगी। कोयला मंत्रालय से अनुरोध किया गया है कि वह सालाना करीब 2.7 करोड़ टन कोयले का आवंटन करे।’ 

यह बोली शक्ति योजना के तहत आमंत्रित की गई है, जिसे केंद्र ने 2017 में शुरू किया था, जिससे देश भर में बिजली की भरपूर आपूर्ति के लिए कोयला लिंकेज सुनिश्चित किया जा सके। बिजली मंत्रालय ने वित्त, स्वामित्व और संचालन (एफओओ) के आधार पर शक्ति (भारत में पारदर्शी रूप से कोयले के उपयोग और आवंटन की योजना) नीति के तहत बोली आमंत्रित की है। इसमें यह भी कहा गया है कि राज्यों के समूह भी बिजली की जरूरतों के मुताबिक किसी एजेंसी के माध्यम से बिजली की खरीद कर सकेंगे। बोली जमा करने की अंतिम तिथि 21 दिसंबर 2022  तक है।



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