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गुजरात हर मानदंड में समृद्ध फिर मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का वादा क्यों!

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इंदिवजल धस्माना /  11 25, 2022






गुजरात की 182 सदस्यीय विधानसभा के लिए पहले चरण में 89 सीटों और दूसरे चरण में 93 सीटों पर चुनाव होगा, 4.09 करोड़ मतदाता हिस्सा लेंगे 

गुजरात सभी मायनों में समृद्ध राज्य है। साल 2020-21 में देश की प्रति व्यक्ति औसत आय 1,46,087 रुपये थी जबकि गुजरात में प्रति व्यक्ति औसत आय राष्ट्रीय औसत से 65 फीसदी अधिक यानी 2,41, 507 रुपये थी। गुजरात में 2015-16 में 18.6 फीसदी आबादी गरीब थी। यह आबादी दिसंबर में दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेगी। 

गुजरात की 182 सदस्यीय विधानसभा के लिए पहले चरण में 89 सीटों और दूसरे चरण में 93 सीटों पर चुनाव होगा। इस चुनाव में 4.09 करोड़ से अधिक मतदाता हिस्सा लेंगे। दूसरी तरफ हर तरह से गरीब के मामले में गुजरात से ज्यादा खराब प्रदर्शन पश्चिम बंगाल का रहा है। पश्चिम बंगाल में 21.43 फीसदी आबादी हर तरह से गरीब थी। इसके अलावा 11 राज्यों में गुजरात से ज्यादा गरीबी थी।

कोई भी यह तर्क दे सकता है कि हर तरह से गरीब की संख्या 2015-16 में जारी की गई थी। लिहाजा, करीब छह साल पुराने आकंड़ों से तस्वीर पेश की गई है। यदि कोई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य आंकड़े (एनएफएच) के 2019-21 के आंकड़े लेता तो राज्य राष्ट्रीय औसत से बहुत अलग नहीं होंगे। 

जैसे 2019-20 में गुजरात में 73.5 फीसदी महिलाएं साक्षर थीं जबकि 2019-21 में अखिल भारतीय स्तर पर 71.5 महिलाएं साक्षर थीं। इस अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर पुरुषों की साक्षरता दर 84.4 फीसदी थी जबकि गुजरात का औसत 87.4 फीसदी था। इस दौरान गुजरात में बेहतर साफ-सफाई की सुविधा से युक्त घरों की हिस्सेदारी 74 फीसदी थी जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 70.2 फीसदी था। गुजरात में 1000 बच्चों पर शिशु मृत्यु दर 31.2 फीसदी थी जो राष्ट्रीय शिशु मृत्यु दर 35.2 फीसदी से कम थी।

हाल के दिनों में राष्ट्रीय औसत से अधिक उच्च मुद्रास्फीति की दर का सामना गुजरात कर चुका है। साल 2021-22 में राज्य की खुदरा मुद्रास्फीति की दर 5.5 फीसदी थी जबकि इस अवधि में इसका राष्ट्रीय औसत 5.3 था। राज्य में ऐसे रुझान इस वित्तीय वर्ष के शुरुआती छह महीनों में भी रहे। इन महीनों में गुजरात की मुद्रास्फीति की दर 7.8 फीसदी थी जबकि इसकी राष्ट्रीय औसत 7.2 फीसदी थी। 

जाहिर है, राज्य के गरीब लोगों की मदद करनी है तो राज्य के पास संसाधन मौजूद हैं। राज्य की राजस्व प्राप्तियों में कर राजस्व की प्राप्ति करीब 55 फीसदी थी। साल 2021-22 और 2022-23 में यह अनुपात 60 फीसदी से अधिक हो सकता है। हालांकि इसके आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं है। इसी तरह राज्य पर ऋण का बोझ भी काफी कम है। 

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने चुनावों के दौरान गुजरात में हर परिवार को 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने और बेरोजगार युवकों को 3000 रुपये प्रति माह देने का वादा किया है। 

इसी तरह कांग्रेस ने 500 रुपये में रसोई गैस सिलिंडर उपलब्ध कराने का चुनावी वादा किया है। राज्य की हालिया आर्थिक स्थिति में ये चुनावी वादे आसानी से पूरे किए जा सकते हैं।  इस मायने में गुजरात आसानी से मुफ्त में रेवड़ियां बांटने की कहीं बेहतर स्थिति में है लेकिन मुद्दा यह है : क्या ऐसा होना चाहिए? 

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य ने 2016-17 में उधार ली गई 80.79 फीसदी राशि पूंजीगत व्यय पर खर्च की थी। यह खर्च चरणबद्ध ढंग से कम होता गया। साल 2020-21 में यह गिरकर 45.5 फीसदी पर आ गया था। यदि धन का इस्तेमाल मुफ्त की रेवड़ियां बांटने में किया जाता है तो उधारी रकम का उपयोग राजस्व व्यय में तेजी से बढ़ेगा। इसे राजकोषीय नजरिये से विवेकपूर्ण नहीं माना जाता है।



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गांवों में दबाव से एमएसएमई को नुकसान

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वित्त वर्ष 2019-20 से अर्थव्यवस्था में मंदी शुरू होने के बाद 14 तिमाहियों में से 6 तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) घटा है। इसमें चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आया 4.3 प्रतिशत संकुचन शामिल है, जब कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था में 6.3 प्रतिशत विस्तार हुआ था। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) द्वारा मापी जाने वाली भौतिक मात्रा भी 42 महीनों में से 14 महीनों के दौरान कम हुई है। 

क्या इसका मतलब यह है कि विनिर्माण पर ढांचागत मसलों का असर पड़ा है? या चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में लुढ़का है, जब बाहरी भूराजनीतिक स्थितियों के कारण इनपुट लागत बढ़ी। पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणव सेन ने कहा कि विनिर्माण में वित्त वर्ष 23 की दूसरी तिमाही में गिरावट आई है, भले ही मांग में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह है कि विनिर्माण क्षेत्र के बजाय सेवा क्षेत्र में मांग है। दरअसल कांटैक्ट सेवाएं जैसे ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट में इस  तिमाही के दौरान करीब 15 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। 

आमदनी का वितरण अमीरों के पक्ष में सिकुड़ा है, ऐसे में संभवतः उन्होंने घरेलू के बजाय विदेशी आयातित सामान की मांग की है। वहीं दूसरी तरफ सूक्ष्म, लघु एवं मझोले (एमएसएमई) क्षेत्र कम मांग के कारण पिटा है। ग्रामीण इलाकों में कम मांग की वजह से ग्रामीण इलाकों में इस क्षेत्र में मौजूदा यूनिटों की पूरी क्षमता के इस्तेमाल के बाद ही आगे इकाइयां स्थापित होंगी।

सरकार की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना बड़े उद्योगों के लिए आई है, जिससे सहायक एमएसएमई उद्योग को भी मदद मिली है। सेन ने कहा कि बहरहाल बड़े एमएसएमई से प्रतिस्पर्धा करने वाले एमएसएमई पिछड़े हैं। दरअसल रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली वस्तु (एफएमसीजी) उद्योग ग्रामीण क्षेत्र में दबाव की शिकायत कर रहा है, जिसकी वजह से गांवों में प्रदर्शन अच्छा नहीं है। उन्होंने कहा कि जब तक इस सेक्टर की चिंता दूर नहीं हो जाती, उनका व्यवहार ऐसा ही रहेगा।

उदाहरण के लिए डाबर इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी मोहित मल्होत्रा ने पिछले महीने कहा था कि वह उम्मीद करते हैं कि एक तिमाही और ग्रामीण इलाकों में दबाव रहेगा। उन्होंने कहा था कि ग्रामीण इलाकों में रिकवरी अगले वित्त वर्ष में ही होने की संभावना है।



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दिसंबर में ‘गर्म सर्दी’: गेहूं व सरसों को खतरा

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इस बार की सर्दी में थोड़ी गर्मी रहने की उम्मीद की जा सकती है। भारतीय मौसम विभाग ने अपने दिसंबर से फरवरी के पूर्वानुमान को लेकर आज बताया कि उत्तर-पश्चिम और उत्तर पूर्वी भारत के कई हिस्सों में इस बार न्यूनतम और अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है। इन सर्दियों में दक्षिणी प्रायद्वीपीय और मध्य भारत में न्यूनतम और अधिकतम तापमान दोनों सामान्य से नीचे रहेंगे। 

हालांकि, यह उत्तरी भारत की कड़ाके की ठंड से कुछ राहत दे सकता है, लेकिन अगर तापमान में असामान्य और असामान्य वृद्धि हुई तो रबी की खड़ी फसलों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। सब्जियों की तुलना में गेहूं पकने के दौरान उच्च तापमान के प्रति संवेदनशील होता है। 

मौसम विभाग के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने आज संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘विभिन्न पैमाने पर मौसम की परस्पर क्रिया के कारण उत्तर-पश्चिम भारत में अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान सामान्य से ऊपर रहेंगे, जिसमें ला नीना की स्थिति भी शामिल है।’ 

उन्होंने कहा कि कम बादल छाए रहने और औसत से कम बारिश के होने से सामान्य से ऊपर तापमान रहेगा। इससे दिन का तापमान अधिक रहेगा। उत्तर भारत की खड़ी रबी फसलों जैसे गेहूं और सरसों पर हल्की गर्म सर्दियों के प्रभाव पर महापात्र ने कहा कि प्रभाव फसल की अवस्था पर निर्भर करेगा और अभी इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। पिछले साल, कटनी से कुछ हफ्ते पहले गर्मी में अचानक वृद्धि के कारण भारत के गेहूं के उत्पादन में भारी गिरावट आई थी। 

इस बीच, दिसंबर के लिए, मौसम विभाग ने कहा कि दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में दिसंबर 2022 के लिए मासिक वर्षा पांच मौसम संबंधी उपखंडों (तमिलनाडु, पुदुच्चेरी और कराईकल, तटीय आंध्र प्रदेश और यनम, रायलसीमा, केरल और माहे और दक्षिण आंतरिक कर्नाटक) से मिलकर बनी है। सबसे अधिक सामान्य रहने की संभावना है दीर्घावधि औसत (एलपीए) का 69-131 फीसदी। 

जबकि, दिसंबर 2022 के दौरान पूरे देश में मासिक वर्षा सामान्य कम रहने की आशंका है, दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों और उत्तर पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों को छोड़कर जहां सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है। मौसम विभाग ने यह भी कहा है कि दिसंबर 2022 के दौरान, प्रायद्वीपीय भारत के अधिकांश हिस्सों, मध्य भारत के कई हिस्सों और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में मासिक न्यूनतम तापमान सामान्य से कम रहने की संभावना है। इसमें कहा गया है कि दिसंबर 2022 में पूर्वोत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों और पूर्व और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक न्यूनतम तापमान रहने की संभावना है। 



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विनिर्माण पीएमआई 55.7 पर पहुंचा

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विनिर्माण के लिए भारत का पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) अक्टूबर के 55.3 से थोड़ा बढ़कर नवंबर में 55.7 हो गया है। यह नए ऑर्डर और उत्पादन में वृद्धि और मुद्रास्फीति में मंदी के बीच तीन महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। प्रमुख आंकड़ा इसके लंबे समय के औसत 53.7 से ऊपर है। 

रेटिंग एजेंसी एसऐंडपी ग्लोबल द्वारा संकलित और गुरुवार को जारी किए गए सर्वे में कारखानों के रोजगार और खरीद में सुधार को दर्शाया है। सर्वे में 50 से अधिक अंक विनिर्माण गतिविधियों में विस्तार दिखाता है। इससे कम अंक संकुचन दर्शाता है। 

सर्वे में कहा, ‘कंपनियां विकास की संभावनाओं के प्रति दृढ़ता से आश्वस्त थीं। आशावाद के साथ रोजगार सृजन और पुनर्भंडारण पहलों का एक और दौर चल रहा था। खरीदारी के स्तर में एक चिह्नित और त्वरित दर से विस्तार हुआ क्योंकि फर्मों ने भी अपेक्षाकृत हल्के मूल्य दबावों से लाभ उठाने की मांग की। इनपुट लागत मुद्रास्फीति 28 महीनों में संयुक्त-सबसे कमजोर दर पर आ गई, जबकि शुल्क फरवरी के बाद से सबसे धीमी गति से बढ़ा।’

सर्वेक्षण में कहा गया है कि नवंबर के आंकड़ों ने पूरे भारत में विनिर्माण उत्पादन में लगातार 17वें विस्तार पर प्रकाश डाला, क्योंकि कंपनियों ने नए काम में चल रही वृद्धि के बारे में जानकारी दी। 

एसऐंडपी ग्लेबस मार्केट इंटेलिजेंस की इकनॉमिक्स एसोसिएट डायरेक्टर पोलीन्ना डे लीमा ने कहा कि भारतीय के विनिर्माण क्षेत्र ने नवंबर में मंदी की आशंका और वैश्विक स्तर पर बिगड़ते आर्थिक दृष्टिकोण के बीच अच्छा प्रदर्शन किया है। 

उन्होंने कहा, ‘माल उत्पादकों के लिए यह सामान्य रूप से व्यवसाय था, जिन्होंने मांग के लचीलेपन के प्रभावशाली साक्ष्य के बीच तीन महीनों में उत्पादन को सबसे बड़ी सीमा तक बढ़ा दिया। नए ऑर्डर और निर्यात में इस महीने में स्पष्ट रूप से विस्तार हुआ है।’ भले ही कंपनियों ने उच्च बिक्री को समायोजित करने के लिए भंडार बनाने और उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन लागत मुद्रास्फीति की दर नवंबर में काफी नरम हो गई। 



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