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कार्बन एमिशन: इन देशों की अगर बड़ी भागीदारी, तो ये दिखा भी रहे उतनी ही ज़िम्मेदारी 

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कार्बन एमिशन: इन देशों की अगर बड़ी भागीदारी, तो ये दिखा भी रहे उतनी ही ज़िम्मेदारी

इस बात में दो राय नहीं कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस एमिशन में वृद्धि हुई है, लेकिन पिछले दशक के औसत के मुक़ाबले यह बहुत कम मात्रा में हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का तो मानना है कि रिन्यूबल बिजली उत्पादन और इलेक्ट्रिक वाहनों के तेजी से बढ़ते चलन ने एमिशन की इस वृद्धि के पैमाने को संभवत दो-तिहाई तक कम कर दिया है।  
इतना ही नहीं, कई अन्य विश्लेषण बताते हैं कि:
• इस वर्ष की पहली छमाही में देखी गई बिजली की मांग में वृद्धि को अकेले रिन्यूबल एनेर्जी की मदद से पूरा कर लिया गया
• विंड टर्बाइन और सौर पैनल अब दुनिया की बिजली का 10% उत्पन्न करते हैं, और वर्तमान विकास दर से 2030 तक यह आंकड़ा 40% तक पहुँच जाएगा
• गाड़ियों के बाज़ार में इलेक्ट्रिक वाहन बड़ी पैठ बना रहे हैं। नई कारों की बिक्री में एलेक्ट्रिक वाहनों की 9% और बस और दोपहिया और तिपहिया वाहनों की बिक्री में एलेक्ट्रिक की लगभग आधी हिस्सेदारी है
• इलैक्ट्रिक मोबिलिटी में यह अप्रत्याशित तीव्र वृद्धि प्रति दिन दस लाख बैरल से अधिक तेल बचा रही है
• स्वच्छ ऊर्जा में वैश्विक निवेश में वृद्धि जारी है, और यह बिजली उत्पादन में लगभग सभी नए निवेश के लिए जिम्मेदार है।
इसी क्रम में, एक ताज़ा रिपोर्ट की मानें तो भारत समेत दुनिया के चारों बड़े उत्सर्जक ज़मीनी स्तर पर एमिशन्स को कम करने के लिए मज़बूती से प्रयासरत हैं।  
इस रिपोर्ट का शीर्षक है ‘द बिग फोर: आर मेजर एमिटर्स डाउनप्लेईंग देयर क्लाइमेट एंड क्लीन एनेर्जी प्रोग्रेस’? (क्या प्रमुख उत्सर्जक अपनी जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा प्रगति को कम करके आंक रहे हैं?)  और इसे तैयार किया है एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ईसीआईयू) नाम की एक वैश्विक संस्था ने।  
इस रिपोर्ट में प्रस्तुत साक्ष्यों से यह संभावना बनती है कि इन बड़े चार उत्सर्जकों में से कम से कम तीन – चीन, यूरोपीय संघ और भारत – न सिर्फ एक स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था की दिशा में तेजी से प्रगति देखेंगे, बल्कि वे अपने राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों के सापेक्ष एमिशन में तेज़ी से गिरावट को भी देखेंगे। और उनके द्वारा की गई प्रगति का निश्चित रूप से वैश्विक प्रभाव पड़ेगा जिसके चलते न सिर्फ ग्रीनहाउस गैस एमिशन कम होंगे बल्कि उनकी तेज प्रगति से अन्य सभी देशों के लिए क्लीन एनेर्जी की कीमतों में तेजी से गिरावट भी देखने को मिलेगी।
इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ईसीआईयू में इंटरनेशनल लीड, गैरेथ रेडमंड-किंग, ने कहा, “जिस गति से एनेर्जी ट्रांज़िशन तेजी से हो रहा है, विशेष रूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था के इन पावरहाउजेज़ में, उससे यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि कैसे सही नीति और बाजार के ढांचे उस गति से बदलाव ला रहे हैं जो कुछ साल पहले अकल्पनीय था। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण और वैश्विक ऊर्जा संकट ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। फिलहाल जीवाश्म ईंधन के उपयोग में एक वृद्धि देखी जा सकती है मगर यह तय है कि ऐसा कुछ बस एक अल्पकालिक समाधान से अधिक कुछ नहीं हैं।”
एक नज़र इन तीन देशों की कार्यवाई पर  
चीन: इस वर्ष 165 GW नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित कर रहा है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 25% अधिक है; 2022 में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री 6 मिलियन होने का अनुमान, जो कि 2021 का दोगुना होगा;
संयुक्त राज्य अमेरिका: सौर और पवन ऊर्जा की तैनाती में चीन के बाद दूसरे नंबर  पर, पूर्वानुमान के अनुसार यहाँ 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा से 85% बिजली उत्पन्न हो सकती है; बिक्री के कुछ पूर्वानुमान बताते हैं कि यहाँ 2030 में खरीदी गई सभी नई कारों में से आधी इलेक्ट्रिक हो सकती हैं;
भारत: इस दशक में अक्षय ऊर्जा, विशेष रूप से सौर, का तेजी से रोलआउट भारत के बिजली क्षेत्र को बदल कर रख देगा, यहाँ कोयला उत्पादन तेजी से लाभहीन होता जा रहा है; सभी रुझान बता रहे हैं भारत अपने 2070 के नेट ज़ीरो एमिशन लक्ष्य की ओर जाते हुए दिख रहा है।
ऊर्जा और चक्र अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने वाले शंघाई स्थित अनुसंधान टैंक, इकोसायकल के कार्यक्रम निदेशक यिक्सिउ वू ने इस पर कहा, “नवीकरणीय ऊर्जा के लिए चीन का समर्थन सुसंगत रहा है और जमीन पर विकसित स्थिति के लिए भी अत्यधिक अनुकूल है। आरई स्थापना उच्च स्तर पर चलती रहती है। चीन और सरकार बिजली बाजार में सुधार को गहरा करने और बिजली व्यवस्था को बदलने के लिए स्मार्ट ग्रिड बनाने के लिए नीतियां पेश कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों के समर्थन के साथ COP27 जलवायु शिखर सम्मेलन का एक प्रमुख फोकस, विश्लेषण इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि हर जगह स्वच्छ ट्रांज़िशन को तेज करने से महंगे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो जाती है। यह बदले में लागत कम करता है, वैश्विक वित्तीय प्रवाह को बदलता है, और खाद्य आपूर्ति को खतरे में डालने वाले जलवायु प्रभावों को कम करता है। यह सुझाव देता है कि सभी देशों के पास खुद को बिजली देने के लिए पर्याप्त नवीकरणीय क्षमता है, यह ऊर्जा सुरक्षा का एक सार्वभौमिक मार्ग है।

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कॉप 27: कमज़ोर देशों के हितों के लिए हुआ एहम फैसला, नहीं हुई एमिशन पर रोक के लिए खास कार्यवाई

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कॉप 27: कमज़ोर देशों के हितों के लिए हुआ एहम फैसला, नहीं हुई एमिशन पर रोक के लिए खास कार्यवाई

संयुक्त राष्ट्र की 27वीं जलवायु वार्ता, या कॉप 27, आज मिस्र में समाप्त हुई। जहां एक ओर इस सम्मेलन में जलवायु संकट के सबसे कमजोर लोगों पर असर को कम करने पर अहम फैसले लिए गए, वहीं इस वार्ता में ग्लोबल वार्मिंग के कारणों को दूर करने के लिए कुछ खास देखने या सुनने को नहीं मिला।
इस कॉप में चर्चाओं के तराज़ू के एक पलड़े में अगर थी विकसित दुनिया की और अधिक मिटिगेशन महत्वाकांक्षा और जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार देशों की सूची का विस्तार तो दूसरे पलड़े में थी विकासशील देशों की बढ़ते जलवायु प्रभावों का सामना और उनसे निपटने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता की मांग। । इस कॉप में तमाम समझौते हुए मगर ग्लासगो में तय हुए एमिशन कटौती की आधार रेखा को बमुश्किल छूया जा सका।
इस कॉप में एक अकल्पनीय पहल ज़रूर हुई। और वो थी जलवायु संकट के प्रभाव के कारण होने वाले “नुकसान और क्षति” से निपटने के लिए, 2023 में अगले कॉप से पहले, दुनिया के सबसे कमजोर जनसमूहों के लिए वित्तीय सहायता संरचना स्थापित करने की प्रतिबद्धता। इसे अकल्पनीय इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि कुछ ही समय पहले इस पर मजबूती से चर्चाओं का दौर शुरू हुआ था और कॉप में इस पर फैसला भी ले लिया गया। ध्यान रहे कि जलवायु परिवर्तन के चलते हानी की कीमत बढ़ कर $200 बिलियन हो चुकी है।
एक चिंता की बात भी रही इस सम्मेलन में। इसमें भविष्य के ऊर्जा स्रोतों के रूप में रिन्यूबल के साथ “लो एमिशन या कम उत्सर्जन” वाले ऊर्जा स्ट्रोटोन पर चर्चा हुई। इससे डर इस बात का बंता है कि इस लो एमिशन जैसे अपरिभाषित शब्द की आड़ में नयी जीवाश्म ईंधन तकनीकों का विकास शुरू हो सकता है।
कॉप 27 पर टिप्पणी करते हुए, उल्का केलकर, निदेशक, जलवायु कार्यक्रम, डब्ल्यूआरआई इंडिया, ने कहा, “नया लॉस एंड डेमेज कोष गरीब और कमजोर देशों के नागरिक समाज समूहों के लिए एक तरह की सुरक्षा की गारंटी है। एक और बढ़िया बात रही बहुपक्षीय विकास बैंकों को साफ संदेश दिया गया कि वह विकासशील देशों को कर्ज में डूबने के लिए मजबूर किए बिना उन्हें अधिक जलवायु वित्त प्रदान करें। COP27 एक नया न्यायसंगत एनेर्जी ट्रांज़िशन कार्यक्रम भी बना है जो भारत जैसे देशों के लिए प्रासंगिक है जिनके पास जीवाश्म ईंधन पर निर्भर क्षेत्रों में बड़े कार्यबल लगे हैं।”
जिस तरह G20 का अंत युद्ध के खिलाफ एक मजबूत बयान के साथ हुआ, वैसे ही COP27 से अंत में सभी जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए वर्तमान ऊर्जा संकट में एक शक्तिशाली प्रतिबद्धता दिखाई जा सकती थी। मगर इसके बजाय, यह केवल एक विविध ऊर्जा मिश्रण का आह्वान करता है, जो कि एक लिहाज से गैस के निरंतर विस्तार को बढ़ावा देता है।
आगे, IISD की वरिष्ठ नीति सलाहकार, श्रुति शर्मा कहती हैं, “यह निराशाजनक है कि COP27 ने COP26 के फैसलों पर आगे खास कदम नहीं बढ़ाए। ऐसा न होने से जीवाश्म ईंधन के फेजआउट पर एक मजबूत संदेश नहीं दिया जा सका। कॉप 26 ने अन्य बातों के साथ-साथ, कोयले के बेरोकटोक फेजडाउन के माध्यम से कम ऊर्जा प्रणालियों कि ओर बढ्ने के लिए पार्टियों से कहा था। भारत के प्रस्ताव के माध्यम से COP27 में उम्मीद थी कि कोयले के तेल और गैस सहित सभी जीवाश्म ईंधनों को धीरे-धीरे समाप्त किया जाए। मगर भारतीय प्रस्ताव के इरादे के बावजूद, हम जानते हैं कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों के साथ चलने और 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान सीमा को पहुंच के भीतर रखने के लिए अब भारी उत्सर्जन में कटौती की आवश्यकता है। इसका मतलब है कि हमें तत्काल (1) कोई नया जीवाश्म ईंधन निवेश नहीं करने की प्रतिबद्धता की आवश्यकता है; (2) कोयले, तेल और गैस के वैश्विक उत्पादन और खपत में कमी के लिए ठोस योजनाएँ, और (3) इन सभी जीवाश्म ईंधनों के लिए सरकारी समर्थन को खत्म करने के लिए फैसले लेने होंगे।”
दुनिया पहले चरण में कोयले को कम करने और उसके बाद तेल और गैस की ओर मुड़ने का जोखिम नहीं उठा सकती है। इस इस वर्ष के कॉप में जीवाश्म ईंधन से दूरी पर खास ज़ोर नहीं दिखा और यह निराशाजनक बात है।
अंत में क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक, आरती खोसला ने निष्कर्ष निकाला, “COP27 निगलने के लिए एक कठिन गोली कि तरह रही है, लेकिन अंत में अनुमान से अधिक प्रगति भी हुई है। यह दर्शाता है कि सभी देश अभी भी इस प्रक्रिया में शामिल होने के इच्छुक हैं और इसका महत्व समझ रही हैं। वार्ताकारों ने भाषा पर बहस की है लेकिन बड़ी तस्वीर में दुनिया ने 1.5 डिग्री तापमान वृद्धि पर भाषा से समझौता न करके एक साल बर्बाद होने से बचा लिया है। इस कॉप को नुकसान और क्षति कोष बनाने के समझौते के लिए याद किया जाएगा। कॉप ने प्रदर्शित किया है कि कैसे भू-राजनीति बदल रही है और प्रत्येक देश ने अपने हितों में काम किया है। नवीनीकरण के पैमाने को शामिल करने में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। देश सभी जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध तरीके से कम करने पर सहमत होने से चूक गए। यह न सिर्फ ऊर्जा संकट पर प्रकाश डालता है बल्कि इस कॉप में और तेल और गैस लॉबी की पकड़ के बारे में भी बताता है।”

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मीथेन कौन्सेंट्रेशन में हुई अब तक कीसबसे बड़ी वृद्धि 

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मीथेन कौन्सेंट्रेशन में हुई अब तक कीसबसे बड़ी वृद्धि 

एक बेहद चिंताजनक घटनाक्रम में, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO), की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 में तीन मुख्य ग्रीनहाउस गैसों – कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का वायुमंडलीय स्तर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। 

WMO के ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन ने 2021 में मीथेन कौन्सेंट्रेशन में साल-दर-साल की सबसे बड़ी छलांग की जानकारी दी। गैसों के वायुमंडलीय कौन्सेंट्रेशन की माप बीते चालीस सालों से हो रही है और यह उछाल बीते 40 साल में सबसे बड़ी है। इस असाधारण वृद्धि का कारण स्पष्ट नहीं है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह जैविक और मानव-प्रेरित दोनों प्रक्रियाओं का परिणाम है। 

साल 2020 से 2021 तक कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में वृद्धि पिछले दशक की औसत वार्षिक वृद्धि दर से अधिक थी। और अब, WMO के ग्लोबल एटमॉस्फियर वॉच नेटवर्क स्टेशनों के डाटा से पता चलता है कि 2022 में भी पूरे विश्व में इन स्तरों में वृद्धि जारी है। 

लंबे समय तक सक्रिय रहने वाली ग्रीनहाउस गैसों द्वारा हमारी जलवायु पर वार्मिंग प्रभाव, साल 1990 और 2021 के बीच, लगभग 50% बढ़ गया। इस वृद्धि का लगभग 80% कार्बन डाइऑक्साइड कि वजह से हुआ। 

2021 में कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता 415.7 भाग प्रति मिलियन (पीपीएम), मीथेन 1908 भाग प्रति बिलियन (पीपीबी) और नाइट्रस ऑक्साइड 334.5 पीपीबी थी। ये आंकड़े पूर्व-औद्योगिक स्तरों के सापेक्ष क्रमशः 149%, 262% और 124% हैं। 

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए डब्ल्यूएमओ के महासचिव प्रो. पेटेरी तालास ने कहा, “डब्लूएमओ के ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन ने एक बार फिर, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती और वैश्विक तापमान को और भी अधिक बढ़ने से रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई की भारी चुनौती – और महत्वपूर्ण आवश्यकता को रेखांकित किया है।” 

उन्होंने आगे कहा, “मीथेन के स्तर में रिकॉर्ड गति से बढ़त के साथ मुख्य गरम तापमान को ट्रेप करने वाली गैसों के कौन्सेंट्रेशन में निरंतर वृद्धि से पता चलता है कि हम गलत दिशा में जा रहे हैं।” 

समस्या का संधान बताते हुए वो कहते हैं, ” जीवाश्म ईंधन क्षेत्र में मीथेन उत्सर्जन से निपटने के लिए लागत प्रभावी रणनीतियां उपलब्ध हैं, और हमें बिना किसी देरी के इन्हें लागू करना चाहिए। हालांकि, मीथेन का जीवनकाल अपेक्षाकृत कम 10 साल से कम है और इसलिए जलवायु पर इसका प्रभाव पलटा जा सकता है। सर्वोच्च और सबसे जरूरी प्राथमिकता के रूप में, हमें कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करना होगा जो जलवायु परिवर्तन और संबंधित चरम मौसम के मुख्य चालक हैं, और जो ध्रुवीय बर्फ के नुकसान, समुद्र के गर्म होने और समुद्र के स्तर में वृद्धि के माध्यम से हजारों वर्षों तक जलवायु को प्रभावित करेगा।” 

मिस्र के शर्म-अल-शेख मेंमें 7-18 नवंबर के बीचहोनेवालेसंयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, COP27  में WMO  इस वैश्विक जलवायु रिपोर्ट को पेश करेगा और बताएगा कि कैसे ग्रीनहाउस गैसें जलवायु परिवर्तन और चरम मौसम घटनाओं को बढ़ा रही हैं।  

WMO की रिपोर्ट COP27 वार्ताकारों को पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 2 से नीचे, अधिमानतः 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए पेरिस समझौते के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अधिक महत्वाकांक्षी कार्रवाई पर कोशिश करने पर केन्द्रित है । औसत वैश्विक तापमान फिलहाल 1850-1900 पूर्व-औद्योगिक औसत से 1.1 डिग्री सेल्सियस अधिक है। 

जलवायु शमन प्रयासों पर बेहतर निर्णयों के लिए ग्रीनहाउस गैस सूचना तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता को देखते हुए, WMO एक व्यापक ग्रीनहाउस गैस समुदाय के साथ काम कर रहा है ताकि निरंतर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित वैश्विक ग्रीनहाउस गैस निगरानी के लिए एक ढांचा विकसित किया जा सके।  

दरअसल WMO ग्रीनहाउस गैसों की वायुमंडलीय सांद्रता को मापता है। वो सांद्रता जो समुद्र और जीवमंडल जैसे सिंक द्वारा गैसों के अवशोषित होने के बाद वातावरण में रहती है। इस सांद्रता को उत्सर्जन नहीं कहा जा सकता है। 

इस रिपोर्ट के साथ ही संयुक्त राष्ट्र ने एक एमिशन्स गैप रिपोर्ट भी जारी की है नवीनतम वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर बताया गया है कि एमिशन्स के मामले में हम कहाँ हैं और हमें कहाँ होना चाहिए। ध्यान रहे कि जब तक उत्सर्जन जारी रहेगा, वैश्विक तापमान में वृद्धि जारी रहेगी।  

बुलेटिन की खास बातें 

कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) 

वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड 2021 में पूर्व-औद्योगिक स्तर के 149% तक पहुंच गया। इसका उत्सर्जन मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के दहन और सीमेंट उत्पादन से उत्सर्जन के कारण होता है। साल 2020 में COVID से संबंधित लॉकडाउन के बाद से वैश्विक उत्सर्जन में फिर से उछाल आया है। 2011-2020 की अवधि के दौरान मानव गतिविधियों से होने वाले कुल उत्सर्जन में से लगभग 48% वायुमंडल में, 26% महासागर में और 29% भूमि पर अब भी जमा हुआ है। 

वैज्ञानिकों को इस बात की भी चिंता है कि भविष्य में एक “कार्बन सिंक” के रूप में कार्य करने के लिए भूमि पारिस्थितिक तंत्र और महासागरों की क्षमता कम प्रभावी हो सकती है। इसके चलते उनके कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने और तापमान वृद्धि के खिलाफ काम करने की उनकी क्षमता कम हो सकती है। 

मीथेन (सीएच4) 

वायुमंडलीय मीथेन जलवायु परिवर्तन में दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है मगर इसके स्रोत और उसके प्रकार द्वारा उत्सर्जन को मापना मुश्किल है। 

साल 2007 के बाद से, विश्व स्तर पर औसत वायुमंडलीय मीथेन सांद्रता तेज़ गति से बढ़ रही है। 1983 में, गैसों के व्यवस्थित रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से, 2020 और 2021 में वार्षिक वृद्धि सबसे ज़्यादा रही है। 

वैश्विक ग्रीनहाउस गैस विज्ञान समुदाय द्वारा अभी भी कारणों की जांच की जा रही है। विश्लेषण इंगित करता है कि 2007 के बाद से मीथेन में नए सिरे से वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान बायोजेनिक स्रोतों से होती है। यह कहना अभी संभव नहीं है कि 2020 में 2021 में अत्यधिक वृद्धि एक जलवायु प्रतिक्रिया का नतीजा है। 

नाइट्रस ऑक्साइड (एन 2 ओ) 

नाइट्रस ऑक्साइड तीसरी सबसे महत्वपूर्ण ग्रीनहाउस गैस है। यह दोनों प्राकृतिक स्रोतों (लगभग 57%) और मानवजनित स्रोतों (लगभग 43%) से वातावरण में उत्सर्जित होता है, जिसमें महासागरों, मिट्टी, बायोमास जलने, उर्वरक उपयोग और विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं शामिल हैं। साल 2020 से 2021 तक की वृद्धि 2019 से 2020 तक देखी गई तुलना में थोड़ी अधिक थी और पिछले 10 वर्षों में औसत वार्षिक वृद्धि दर से अधिक थी। 

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83 प्रतिशत भारतीय जनता चाहती है जलवायु परिवर्तन पर सरकारी जागरूकता कार्यक्रम 

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83 प्रतिशत भारतीय जनता चाहती है जलवायु परिवर्तन पर सरकारी जागरूकता कार्यक्रम

इस सर्वे में शामिल 64% लोगों का कहना है कि भारत सरकार को ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए और अधिक प्रयास करने चाहिए

एक ताज़ा सर्वेक्षण से पता चलता है कि भारत की 80 फीसद से ऊपर जनता ग्लोबल वार्मिंग से चिंतित है और सरकार से उसके खिलाफ अधिक कार्यवाही की मांग कर रही है।
इतना ही नहीं, सर्वे में शामिल 74 फीसद लोग मानते हैं कि उन्होने निजी तौर पर ग्लोबल वार्मिंग और बदलती जलवायु के असर को महसूस किया है।
दरअसल इन बातों का खुलासा हुआ है आज जारी येल युनिवेर्सिटी के क्लाइमेट चेंज कम्यूनिकेशन प्रोग्राम और सी वोटर इंटरनेशनल द्वारा किए गए एक सर्वे के नतीजों में। इन दोनों ही संस्थाओं ने साल 2011 में भी ऐसा एक सर्वे किया था और औजूड़ा सर्वे उसी सर्वे के सापेक्ष किया गया है।
“क्लाइमेट चेंज इन द इंडियन माइंड, 2022” शीर्षक वाली इस सर्वे रिपोर्ट में पाया गया कि भारत में 84% लोग कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग हो रही है (2011 से 15 प्रतिशत अधिक), 57% लोगों का कहना है कि यह ज्यादातर मानवीय गतिविधियों के कारण होता है, और 74% लोग कहते हैं कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से इन प्रभावों का अनुभव किया है (2011 से +24 प्रतिशत अधिक)। साथ ही, भारत में 81% लोग ग्लोबल वार्मिंग से चिंतित हैं, जिनमें 50% लोग “बहुत चिंतित” हैं (2011 से +30 प्रतिशत अधिक) और 49% लोग सोचते हैं कि भारत में लोग पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग (2011 से +29 प्रतिशत) का नुकसान झेल रहे हैं।
इस सब से इतर, भारत में केवल आधे लोगों (52%) का कहना है कि वे महीने में कम से कम एक बार मीडिया में ग्लोबल वार्मिंग के बारे में सुनते हैं।
इस बारे में येल विश्वविद्यालय के डॉ. एंथनी लीसेरोविट्ज़ कहते हैं, ” रिकॉर्ड स्तर की हीटवेव हो या गंभीर बाढ़ या फिर तेज तूफान, भारत पहले से ही जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। लेकिन बावजूद इसके भारत में अभी भी बहुत से लोग ग्लोबल वार्मिंग के बारे में ज्यादा नहीं जानते। उन्हें बस इतना पता है कि जलवायु बदल रही है और उन्होने व्यक्तिगत रूप से उन प्रभावों का अनुभव किया है।”
सर्वे कि कुछ खास बातें:

· सर्वे में शामिल 64% लोगों का कहना है कि भारत सरकार को ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए और अधिक प्रयास करने चाहिए।
· 55% का कहना है कि देश को अन्य देशों के कार्य करने की प्रतीक्षा किए बिना अपने उत्सर्जन को तुरंत कम करना चाहिए।
· 83% सभी लोगों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के बारे में सिखाने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया जाना चाहिए।
· 82% लोग स्थानीय समुदायों को स्थानीय जल आपूर्ति बढ़ाने के लिए चेक डैम बनाने के लिए प्रोत्साहित करने कि बात करते हैं।
· 69% लोग वन क्षेत्रों के संरक्षण या विस्तार का समर्थन करते हैं, भले ही इसका मतलब कृषि या आवास के लिए कम भूमि का उपलब्ध होना हो।
· 66% जनता कहती है कि अब आवश्यकता है ऐसी आटोमोबाइल तकनीकों की जो अधिक ईंधन कुशल हों, भले ही इससे कारों और बस किराए की लागत बढ़ जाए।
· 62% सोचते हैं कि कुल मिलाकर, ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए कार्यवाही करने से या तो आर्थिक विकास में सुधार होगा और नई नौकरियां (45%) उपलब्ध होंगी या आर्थिक विकास या नौकरियों (17%) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। केवल 19 फीसदी सोचते हैं कि इससे आर्थिक विकास कम होगा और नौकरियों की लागत घटेगी।
· 59% का मानना है कि भारत को ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों का उपयोग बढ़ाना चाहिए, जबकि केवल 13% का मानना है कि भारत को जीवाश्म ईंधन के उपयोग में वृद्धि करनी चाहिए।
इस संदर्भ में ऑकलैंड विश्वविद्यालय के डॉ. जगदीश ठक्कर कहते हैं, “भारतीय जनता जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्यवाही का पुरजोर समर्थन करती है। और महत्वपूर्ण रूप से, अधिकांश जनता देश की बिजली आपूर्ति के लिए जीवाश्म ईंधन के मुक़ाबले रिन्यूबल एनेर्जी को अधिक महत्व देती है।”
सीवोटर इंटरनेशनल के संस्थापक और निदेशक यशवंत देशमुख कहते हैं, “ट्रेंडलाइन स्पष्ट हैं। पिछले एक दशक में, भारतीय जनता जलवायु परिवर्तन और जलवायु नीतियों को लेकर अधिक चिंतित हो गयी है और चाहती है कि भारत सरकार जलवायु परिवर्तन पर एक वैश्विक नेता बने।”
अक्टूबर 2021 से जनवरी 2022 के बीच हुए इस सर्वे में 4,619 भारतीय वयस्क (18+) शामिल थे।

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