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ऑनलाइन दौर में शाखाओं पर जोर

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अभिषेक कुमार / मुंबई 11 18, 2022






कोविड-19 के बाद म्युचुअल फंड उद्योग ने डिजिटलीकरण में अच्छी तेजी दर्ज की है और बैंक खाते तथा फोन नंबर में बदलाव समेत लगभग हरेक कार्य और सौदे ऑनलाइन के जरिये हो रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद परिसंप​त्ति प्रबंधन कंपनियां (एएमसी) अपनी पारंपरिक शाखाएं खोलने से परहेज नहीं कर रही हैं। तथ्य यह है कि इन कंपनियों ने कोविड के बाद डिजिटलीकरण में तेजी आने के बावजूद अपनी शाखाओं की संख्या में लगातार इजाफा किया है। 

एसबीआई म्युचुअल फंड ने जनवरी 2020 से करीब 55 नई शाखाएं खोली हैं। देश के इस सबसे बड़े फंड हाउस की पुरुलिया, मिर्जापुर, चाईबासा, श्रीकाकुलम जैसे छोटे शहरों में भी पारंपरिक उपस्थिति है। एसबीआई म्युचुअल फंड के उप-प्रबंध निदेशक एवं मुख्य व्यावसायिक अधिकारी डी पी सिंह ने कहा, ‘कोविड-19 की वजह से लगाए गए लॉकडाउन ने ऑनलाइन को निवेशकों से जोड़े रखने का पसंदीदा माध्यम बना दिया, लेकिन हमारा मानना है कि ऑफलाइन बातचीत भी उन लाखों निवेशकों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है जो आमने-सामने बैठकर समझना ज्यादा उपयुक्त मानते हैं। हमारी सेवाओं को भारत में कम सुविधाओं वाले शहरों में पहुंचाने के लिए शाखाएं बेहद जरूरी हैं। इस लक्ष्य के साथ हमने जनवरी 2020 से करीब 55 शाखाएं खोली हैं।

आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल और ऐक्सिस जैसी अन्य प्रमुख एएमसी ने भी पिछले एक साल में करीब आधा दर्जन नई शाखाएं खोली हैं। म्युचुअल फंडों ने शाखाओं पर अपना ध्यान बढ़ाया है, क्योंकि अब प्रतिस्पर्धा प्रमुख शहरों से बी-30 इलाकों तक पहुंच गई है। बी-30 क्षेत्रों में रह रहे लोगों में म्युचुअल फंडों के बारे में जानकारी बढ़ रही है और एमएफ उद्योग इन इलाकों से वितरक जोड़ने पर ध्यान दे रहा है।

सितंबर 2022 तक, बी-30 इलाकों के निवेशकों का कुल एयूएम में 17 प्रतिशत योगदान था जो एक साल पहले के 16 प्रतिशत से ज्यादा है। बी-30 क्षेत्रों में एमएफ वितरकों की संख्या मार्च 2020 में 40,400 थी जो अक्टूबर 2022 में बढ़कर 54,700 हो गई।

 करीब 300 स्थानों पर शाखाओं की उपस्थिति वाले निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड के सह-मुख्य व्यावसायिक अधिकारी सौगत चटर्जी ने कहा, ‘शाखाएं महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि कई नए निवेशक टियर-2 और टियर-3 शहरों से जुड़ रहे हैं।’ एमएफ अधिकारियों के अनुसार, जहां डिजिटलीकरण ने हरेक लेनदेन ऑनलाइन के जरिये संभव बना दिया है, वहीं सभी निवेशक ऐसा करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं।

शाखाएं दृश्यता और भरोसे के नजरिये से भी महत्वपूर्ण हैं। उनका कहना है कि पारंपरिक उपस्थिति जरूरी है, क्योंकि नए निवेशक इससे व्यवसाय में आसानी से भरोसा करते हैं। इसके अलावा, शाखाएं एमएफ स्टाफ और वितरकों के लिए मीटिंग पॉइंट के तौर पर भी काम करते हैं।



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गांवों में दबाव से एमएसएमई को नुकसान

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वित्त वर्ष 2019-20 से अर्थव्यवस्था में मंदी शुरू होने के बाद 14 तिमाहियों में से 6 तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) घटा है। इसमें चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आया 4.3 प्रतिशत संकुचन शामिल है, जब कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था में 6.3 प्रतिशत विस्तार हुआ था। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) द्वारा मापी जाने वाली भौतिक मात्रा भी 42 महीनों में से 14 महीनों के दौरान कम हुई है। 

क्या इसका मतलब यह है कि विनिर्माण पर ढांचागत मसलों का असर पड़ा है? या चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में लुढ़का है, जब बाहरी भूराजनीतिक स्थितियों के कारण इनपुट लागत बढ़ी। पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणव सेन ने कहा कि विनिर्माण में वित्त वर्ष 23 की दूसरी तिमाही में गिरावट आई है, भले ही मांग में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह है कि विनिर्माण क्षेत्र के बजाय सेवा क्षेत्र में मांग है। दरअसल कांटैक्ट सेवाएं जैसे ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट में इस  तिमाही के दौरान करीब 15 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। 

आमदनी का वितरण अमीरों के पक्ष में सिकुड़ा है, ऐसे में संभवतः उन्होंने घरेलू के बजाय विदेशी आयातित सामान की मांग की है। वहीं दूसरी तरफ सूक्ष्म, लघु एवं मझोले (एमएसएमई) क्षेत्र कम मांग के कारण पिटा है। ग्रामीण इलाकों में कम मांग की वजह से ग्रामीण इलाकों में इस क्षेत्र में मौजूदा यूनिटों की पूरी क्षमता के इस्तेमाल के बाद ही आगे इकाइयां स्थापित होंगी।

सरकार की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना बड़े उद्योगों के लिए आई है, जिससे सहायक एमएसएमई उद्योग को भी मदद मिली है। सेन ने कहा कि बहरहाल बड़े एमएसएमई से प्रतिस्पर्धा करने वाले एमएसएमई पिछड़े हैं। दरअसल रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली वस्तु (एफएमसीजी) उद्योग ग्रामीण क्षेत्र में दबाव की शिकायत कर रहा है, जिसकी वजह से गांवों में प्रदर्शन अच्छा नहीं है। उन्होंने कहा कि जब तक इस सेक्टर की चिंता दूर नहीं हो जाती, उनका व्यवहार ऐसा ही रहेगा।

उदाहरण के लिए डाबर इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी मोहित मल्होत्रा ने पिछले महीने कहा था कि वह उम्मीद करते हैं कि एक तिमाही और ग्रामीण इलाकों में दबाव रहेगा। उन्होंने कहा था कि ग्रामीण इलाकों में रिकवरी अगले वित्त वर्ष में ही होने की संभावना है।



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दिसंबर में ‘गर्म सर्दी’: गेहूं व सरसों को खतरा

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इस बार की सर्दी में थोड़ी गर्मी रहने की उम्मीद की जा सकती है। भारतीय मौसम विभाग ने अपने दिसंबर से फरवरी के पूर्वानुमान को लेकर आज बताया कि उत्तर-पश्चिम और उत्तर पूर्वी भारत के कई हिस्सों में इस बार न्यूनतम और अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है। इन सर्दियों में दक्षिणी प्रायद्वीपीय और मध्य भारत में न्यूनतम और अधिकतम तापमान दोनों सामान्य से नीचे रहेंगे। 

हालांकि, यह उत्तरी भारत की कड़ाके की ठंड से कुछ राहत दे सकता है, लेकिन अगर तापमान में असामान्य और असामान्य वृद्धि हुई तो रबी की खड़ी फसलों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। सब्जियों की तुलना में गेहूं पकने के दौरान उच्च तापमान के प्रति संवेदनशील होता है। 

मौसम विभाग के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने आज संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘विभिन्न पैमाने पर मौसम की परस्पर क्रिया के कारण उत्तर-पश्चिम भारत में अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान सामान्य से ऊपर रहेंगे, जिसमें ला नीना की स्थिति भी शामिल है।’ 

उन्होंने कहा कि कम बादल छाए रहने और औसत से कम बारिश के होने से सामान्य से ऊपर तापमान रहेगा। इससे दिन का तापमान अधिक रहेगा। उत्तर भारत की खड़ी रबी फसलों जैसे गेहूं और सरसों पर हल्की गर्म सर्दियों के प्रभाव पर महापात्र ने कहा कि प्रभाव फसल की अवस्था पर निर्भर करेगा और अभी इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। पिछले साल, कटनी से कुछ हफ्ते पहले गर्मी में अचानक वृद्धि के कारण भारत के गेहूं के उत्पादन में भारी गिरावट आई थी। 

इस बीच, दिसंबर के लिए, मौसम विभाग ने कहा कि दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में दिसंबर 2022 के लिए मासिक वर्षा पांच मौसम संबंधी उपखंडों (तमिलनाडु, पुदुच्चेरी और कराईकल, तटीय आंध्र प्रदेश और यनम, रायलसीमा, केरल और माहे और दक्षिण आंतरिक कर्नाटक) से मिलकर बनी है। सबसे अधिक सामान्य रहने की संभावना है दीर्घावधि औसत (एलपीए) का 69-131 फीसदी। 

जबकि, दिसंबर 2022 के दौरान पूरे देश में मासिक वर्षा सामान्य कम रहने की आशंका है, दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों और उत्तर पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों को छोड़कर जहां सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है। मौसम विभाग ने यह भी कहा है कि दिसंबर 2022 के दौरान, प्रायद्वीपीय भारत के अधिकांश हिस्सों, मध्य भारत के कई हिस्सों और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में मासिक न्यूनतम तापमान सामान्य से कम रहने की संभावना है। इसमें कहा गया है कि दिसंबर 2022 में पूर्वोत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों और पूर्व और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक न्यूनतम तापमान रहने की संभावना है। 



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विनिर्माण पीएमआई 55.7 पर पहुंचा

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विनिर्माण के लिए भारत का पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) अक्टूबर के 55.3 से थोड़ा बढ़कर नवंबर में 55.7 हो गया है। यह नए ऑर्डर और उत्पादन में वृद्धि और मुद्रास्फीति में मंदी के बीच तीन महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। प्रमुख आंकड़ा इसके लंबे समय के औसत 53.7 से ऊपर है। 

रेटिंग एजेंसी एसऐंडपी ग्लोबल द्वारा संकलित और गुरुवार को जारी किए गए सर्वे में कारखानों के रोजगार और खरीद में सुधार को दर्शाया है। सर्वे में 50 से अधिक अंक विनिर्माण गतिविधियों में विस्तार दिखाता है। इससे कम अंक संकुचन दर्शाता है। 

सर्वे में कहा, ‘कंपनियां विकास की संभावनाओं के प्रति दृढ़ता से आश्वस्त थीं। आशावाद के साथ रोजगार सृजन और पुनर्भंडारण पहलों का एक और दौर चल रहा था। खरीदारी के स्तर में एक चिह्नित और त्वरित दर से विस्तार हुआ क्योंकि फर्मों ने भी अपेक्षाकृत हल्के मूल्य दबावों से लाभ उठाने की मांग की। इनपुट लागत मुद्रास्फीति 28 महीनों में संयुक्त-सबसे कमजोर दर पर आ गई, जबकि शुल्क फरवरी के बाद से सबसे धीमी गति से बढ़ा।’

सर्वेक्षण में कहा गया है कि नवंबर के आंकड़ों ने पूरे भारत में विनिर्माण उत्पादन में लगातार 17वें विस्तार पर प्रकाश डाला, क्योंकि कंपनियों ने नए काम में चल रही वृद्धि के बारे में जानकारी दी। 

एसऐंडपी ग्लेबस मार्केट इंटेलिजेंस की इकनॉमिक्स एसोसिएट डायरेक्टर पोलीन्ना डे लीमा ने कहा कि भारतीय के विनिर्माण क्षेत्र ने नवंबर में मंदी की आशंका और वैश्विक स्तर पर बिगड़ते आर्थिक दृष्टिकोण के बीच अच्छा प्रदर्शन किया है। 

उन्होंने कहा, ‘माल उत्पादकों के लिए यह सामान्य रूप से व्यवसाय था, जिन्होंने मांग के लचीलेपन के प्रभावशाली साक्ष्य के बीच तीन महीनों में उत्पादन को सबसे बड़ी सीमा तक बढ़ा दिया। नए ऑर्डर और निर्यात में इस महीने में स्पष्ट रूप से विस्तार हुआ है।’ भले ही कंपनियों ने उच्च बिक्री को समायोजित करने के लिए भंडार बनाने और उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन लागत मुद्रास्फीति की दर नवंबर में काफी नरम हो गई। 



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