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इश्क, हनीमून और धरोहर… अमेरिका के परमाणु हमले से कैसे बच गया था क्योटो? दिल छू ये लेगी कहानी

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वॉशिंगटन/टोक्यो : हिरोशिमा और नागासाकी, जब भी जापान के इन दो शहरों का नाम हम सुनते हैं तो हमारे दिमाग में क्या आता है? आग का दरिया, मशरूम जैसा धुएं का बादल और तबाही लेकिन क्या आप जानते हैं 6 अगस्त को हिरोशिमा पर बम गिराने के बाद जापान का नागासाकी शहर अमेरिका की टारगेट लिस्ट में नहीं था। दरअसल अमेरिकी बमवर्षक विमान जापान के कोकुरा शहर पर परमाणु बम गिराने जा रहे थे लेकिन कुछ कारणों से उन्हें अपना टारगेट बदलना पड़ा। 9 अगस्त 1945 को कोकुरा शहर पर बादल छाए थे और हिरोशिमा धमाके के बाद काले धुएं ने इस शहर के आसमान को घेर रखा था। ये धुआं और बादल ही कोकुरा के लिए रक्षक बने और अमेरिकी पायलटों ने अपने सेकेंडरी टारगेट नागासाकी पर ‘फैटमैन बम’ गिराने का फैसला किया। लेकिन आज आपको कहानी सुनाएंगे जापान के एक तीसरे शहर की जो अमेरिका की टारगेट लिस्ट में शामिल था। इस शहर का नाम है क्योटो जिसके परमाणु हमले से बचने की कहानी बेहद दिलचस्प है।

वह 1920 का दशक था, कहा जाता है कि अमेरिका के युद्ध मंत्री हेनरी एल. स्टिमसन अपनी पत्नी के साथ हनीमून मनाने के लिए जापान के क्योटो शहर आए थे। इस शहर के खूबसूरत नजारों ने उनके मन को मोह लिया और वह इसकी सुंदरता और संस्कृति को तबाह होते नहीं देखना चाहते थे। अमेरिका ने जब परमाणु हमले के लिए शहरों की लिस्ट बनाई तो स्टिमसन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हेनरी ट्रूमैन के सामने क्योटो को इस लिस्ट से हटाने की मांग को लेकर अड़ गए।

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अमेरिका की टारगेट कमेटी की पहली मीटिंग
द्वितीय विश्व युद्ध अपने अंजाम तक पहुंच रहा था। लेकिन जापान झुकने के लिए तैयार नहीं था। अमेरिका ने जापान के खिलाफ अपने मैनहट्टन प्रोजेक्ट के तहत तैयार दुनिया के पहले परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने का फैसला किया। 27 अप्रैल 1945 को अमेरिका की टारगेट कमेटी की एक मीटिंग हुई। इसमें कुछ मानक तय किए गए जिनके आधार पर टारगेट का चुनाव किए गए। तय किया गया कि परमाणु हमले के लिए चुना जाने वाला शहर आकार में बड़ा होना चाहिए और इसकी आबादी भी अच्छी खासी होनी चाहिए।

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सबसे अहम बात इस शहर में सैन्य प्रतिष्ठान मौजूद हों ताकि जापान को युद्ध में कमजोर किया जा सके। इसमें टोक्यो को संभवतः इसलिए नहीं चुना गया क्योंकि उस पर बमबारी अमेरिकी वायुसेना उसे पहले ही बर्बाद कर चुकी थी। लंबी मशक्कत के बाद करीब 17 जापानी शहर चुने गए। टारगेट लिस्ट में हिरोशिमा टॉप पर इसलिए था क्योंकि अमेरिकी हमलों से इस शहर को अब तक सबसे कम नुकसान पहुंचा था। मैनहट्टन प्रोजेक्ट के प्रमुख जनरल लेजली ग्रोव्स ने साफ कर दिया कि टारगेट लिस्ट में पहले नंबर पर हिरोशिमा और दूसरे नंबर पर क्योटो और तीसरे नंबर पर योकोहोमा होगा।

आखिर क्यों आंख का काटा बना हुआ था क्योटो?
कहा जाता है कि क्योटो को परमाणु वैज्ञानिक और सैन्य अधिकारी इसलिए निशाना बनाना चाहते थे क्योंकि इस शहर में कई प्रमुख विश्वविद्यालय थे और कई बड़े उद्योग यहां से संचालित होते थे। इतना ही नहीं इस शहर में 2000 बौद्ध मंदिर और कई ऐतिहासिक धरोहरें मौजूद थीं। जापान के लिए क्योटो की अहमियत को देखते हुए बैठकों में इसे पहला टारगेट तय किया गया। साल 1945 में हेनरी एल स्टिमसन अमेरिका के युद्ध मंत्री थे और युद्ध से जुड़े सभी फैसलों में उनकी भूमिका प्रमुख रहती थी।

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‘मैं नहीं चाहता कि क्योटो पर बम गिराया जाए’
अमेरिकी राष्ट्रपति के करीबी होने की वजह से वह कई फैसलों को टालने और बदलने की भी क्षमता रखते थे। तारीख थी 30 मई 1945, अमेरिका में एक और मीटिंग हुई जिसमें स्टिमसन ने ग्रोव्स से साफ शब्दों में कह दिया, ‘मैं नहीं चाहता कि क्योटो पर बम गिराया जाए।’ अब एक तरफ स्टिमसन थे और दूसरी तरफ तमाम सैन्य अधिकारी और परमाणु वैज्ञानिक जो क्योटो को टारगेट लिस्ट से हटाने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि बात काफी आगे निकल चुकी थी। आखिर स्टिमसन ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन के सामने गुहार लगाई। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा कि मैंने राष्ट्रपति को सुझाव दिया कि जापान के लोग क्योटो के साथ भावनात्मक रूप से मजबूती से जुड़े हुए हैं और अगर इस शहर पर बम गिराया गया तो भविष्य में दोनों देशों के संबंध कभी सुधर नहीं पाएंगे और रूस इसका फायदा उठा सकता है।

हनीमून की यादें और इश्क ने क्योटो को दी नई जिंदगी
स्टिमसन ने लिखा, ‘राष्ट्रपति मेरी बात से सहमत थे।’ स्टिमसन की क्योटो के साथ कुछ निजी यादें भी जुड़ी थीं। इस शहर के रूप में वह उन पलों को भी बर्बाद होने से बचाना चाहता थे जिन्हें उन्होंने हनीमून के दौरान अपनी पत्नी के साथ क्योटो में बिताया था। आखिरकार वही हुआ जो स्टिमसन चाहते थे और क्योटो का नाम अमेरिका की टारगेट लिस्ट से हट गया। इसमें युद्ध मंत्री के रूप में उनके प्रभाव और राष्ट्रपति के साथ उनके करीबी संबंधों ने बड़ी भूमिका निभाई। क्योटो की खूबसूरती, संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरों ने 1945 में इस शहर की रक्षा की लेकिन नागासाकी अमेरिकी प्रकोप से बच न सका।



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पाकिस्‍तान संग F-16 डील, बाजवा की यात्रा… जानें क्‍यों इसे भारत-रूस दोस्‍ती पर अमेरिका की चेतावनी बता रहे विशेषज्ञ

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वॉशिंगटन/इस्‍लामाबाद: साल 2008 में परमाणु डील के बाद भारत और अमेरिका के बीच संबंध नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं। भारत न केवल अमेरिका के साथ बड़े पैमाने पर हथियार खरीद रहा है, बल्कि क्‍वॉड जैसे संगठन में कंधे से कंधा मिला मिलाकर चल रहा है। इस बीच अब अमेरिका अचानक से भारत के दुश्‍मन पाकिस्‍तान के साथ अपने रिश्‍तों को फिर से मजबूत करने में जुट गया है। अमेरिका ने पाकिस्‍तान के F-16 फाइटर जेट के लिए करोड़ों डॉलर का पैकेज दिया है, बाढ़ पीड़‍ितों के लिए बाइडन ने बड़े पैमाने पर मदद भेजी और अब पाकिस्‍तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा अमेरिका की यात्रा पर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की रूस के साथ दोस्‍ती बरकरार रखने वाले भारत को चेतावनी है। वे पाकिस्‍तान को भारत-रूस दोस्‍ती के खिलाफ अमेरिका का प्‍लान बी तक बता रहे हैं। आइए समझते हैं पूरा मामला…

पाकिस्‍तान और अमेरिका के संबंध ट्रंप प्रशासन के कार्यकाल में रसातल में चले गए थे। अमेरिकी राष्‍ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्‍तान को दी जाने वाले मदद को भी बंद कर दिया था। अमेरिका में जो बाइडन के राष्‍ट्रपति बनने के बाद पाकिस्‍तान के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान चाहते थे कि वह उनसे फोन पर बात करें लेकिन यह संभव नहीं हुआ। इमरान खान ने यूक्रेन युद्ध शुरू होने के ठीक बाद रूस की यात्रा की जिससे अमेरिका भड़क गया था। दोनों देशों के बीच संबंध उस समय सबसे खराब दौर में चले गए थे जब इमरान खान ने आरोप लगाया कि अमेरिका ने उनकी सरकार को गिराने की साजिश रची। यही नहीं अमेरिका इस बात से भी नाराज था कि पाकिस्‍तान तालिबान को समर्थन दे रहा है और चीन के साथ रिश्‍ते मजबूत कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद पाकिस्‍तान में शहबाज शरीफ की सरकार आई जो अब अमेरिका के साथ अपने रिश्‍ते को मजबूत करने में जुट गई है।
मूर्ख मत बनाइए! पता है F-16 का इस्तेमाल किसके खिलाफ किया जाता है… US-पाकिस्तान की दोस्ती पर जयशंकर की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
बाजवा अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले अमेरिका पहुंचे
शहबाज शरीफ ने अमेरिका यात्रा के दौरान बाइडन से मुलाकात की है। पाकिस्‍तानी विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने अमेरिका के विदेश मंत्री के साथ कई बैठकें की हैं। वहीं अब आर्मी चीफ बाजवा अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले अमेरिका पहुंचे हैं। कई पश्चिमी विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका अब भारत और पाकिस्‍तान के साथ रिश्‍तों में फिर से संतुलन बना रहा है। इन पश्चिमी विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव भारत के लगातार रूस का पक्ष लेने और पाकिस्‍तान के अलकायदा समेत आतंकियों के खिलाफ अमेरिकी मदद के बाद हुआ है। जीजीरो की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका अब दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्‍तान के बीच वही गेम फिर से दोहरा रहा है जो वह दशकों से खेल रहा है। पाकिस्‍तान अब अमेरिका के लिए ‘प्‍लान बी’ बन गया है।

शनिवार को अमेरिका की ओर से रूस के खिलाफ लाए गए प्रस्‍ताव पर भारत तटस्‍थ रहा और वोटिंग में हिस्‍सा नहीं लिया। भारत ने इससे पहले भी रूस के खिलाफ लाए गए प्रस्‍ताव पर मतदान में हिस्‍सा नहीं लिया था। भारत ने साफ कह दिय है कि वह अपने हितों को ध्‍यान में रखकर ही कोई फैसला लेगा। पीएम मोदी ने पुतिन के सामने ही उन्‍हें नसीहत दी थी कि यह युद्ध का युग नहीं है। भारतीय प्रधानमंत्री के बयान की अमेरिका ने तारीफ की थी। अब भारत के वोट नहीं देने से अमेरिका को झटका लगा है। अमेरिका के साथ बढ़ती दोस्‍ती के बाद भी भारत ने रूस के साथ रिश्‍ते को मजबूत करना जारी रखा है और एस-400 जैसे अत्‍याधुनिक हथियारों को ले रहा है। अमेरिका के रैंड कार्पोरेशन में रक्षा विश्‍लेषक डेरेक ग्रॉसमैन कहते हैं, ‘रूस ने जब से यूक्रेन में हमला किया है, पीएम मोदी और उनकी सरकार ने विदेश नीति को लेकर बहुत ही यथार्थवादी रवैया अपना रखा है।’ उन्‍होंने कहा कि भारत ने इस हमले की आलोचना की बजाय रूस से तेल खरीदा है और मूल्‍यों की बजाय बिजनस को तवज्‍जो दी है।
जयशंकर का मैराथन दौरा, 10 दिन में 50 मीटिंग… अमेरिका में दिखा विदेश मंत्री का ‘सुपर स्टैमिना’, सब हैरान
अमेरिका का ‘प्‍लान बी’ है पाकिस्‍तान ?

रिपोर्ट के मुताबिक भारत के इस रुख पर अमेरिका अब प्‍लान बी पर काम कर रहा है और पाकिस्‍तान के साथ संतुलित रक्षा संबंध बना रहा है। साल 2018 में पाकिस्‍तान के साथ सभी तरह के रक्षा संबंध रोकने के बाद अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने पिछले महीने अपने रुख में बड़ा बदलाव किया और पाकिस्‍तान के एफ- 16 फाइटर जेट को अपग्रेड करने के लिए एक बड़े पैकेज का ऐलान कर दिया। यह वही फाइटर जेट है जिसका इस्‍तेमाल पाकिस्‍तान ने भारतीय मिग-21 फाइटर जेट को मार गिराने के लिए किया था। भारत ने इस पैकेज का कड़ा विरोध किया। विदेश मंत्री जयशंकर ने यहां तक कह दिया कि अमेरिका मूर्ख बना रहा है। भारत के विरोध पर अमेरिका ने कहा कि वह दोनों ही देशों के साथ संबंधों को तवज्‍जो देता है और यह मदद आतंकवाद के खिलाफ है।

अब पाकिस्‍तान के सबसे शक्तिशाली इंसान आर्मी चीफ जनरल बाजवा अमेरिका के दौरे पर पहुंच गए हैं। बाजवा का अमेरिका के कई शीर्ष अधिकारियों और मंत्रियों से मिलने का कार्यक्रम है। बाजवा के इशारे पर ही अमेरिका विरोधी इमरान खान की सत्‍ता गई थी। पाकिस्‍तानी सेना अब अमेरिका की अफगानिस्‍तान में आतंकवाद को रोकने, तालिबान, अलकायदा और आईएसआईएस के पर नकेल कसने में मदद करने जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव के बाद भी अमेरिका के लिए भारत आगे भी काफी महत्‍वपूर्ण बना रहेगा। अमेरिका और भारत दोनों का ही शत्रु चीन है। वहीं चीन की गोद में जा चुका पाकिस्‍तान अब अमेरिका के साथ अपने रिश्‍तों को मजबूत बनाने में जुट गया है ताकि तब तक संतुलन बनाए रखा जाए जब तक कि चीन उन्‍हें कोई बढ़‍िया ऑफर न दे दे। अमेरिका की पाकिस्‍तान को सैन्‍य सहायता भारत के साथ हो रहे रक्षा गठजोड़ की तुलना में बहुत ही कम है। भारत अमेरिका का रणनीतिक साझीदार बन चुका है।
अमेरिका में बज रहा भारत का डंका, महामारी में छोटे देशों के लिए बना ‘हीरो’, न्यूयॉर्क में सबने कहा- थैंक्यू!
पाकिस्‍तान संग दोस्‍ती के बाद भी अमेरिका-भारत के रिश्‍ते रहेंगे मजबूत
दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन कहते हैं कि भारत और अमेरिका दोनों ही एक-दूसरे के शत्रु देश के साथ अपने रिश्‍ते को एक बार फिर से मजबूत करने में जुट गए हैं। भारत पहले रूस से हथियारों की निर्भरता को घटा रहा था लेकिन अब यह बढ़ गया है। वहीं अमेरिका पाकिस्‍तान को सैन्‍य मदद देना फिर से शुरू कर चुका है। अमेरिका एक तरह से भारत और रूस के रिश्‍ते के जवाब में पाकिस्‍तान को मदद दे रहा है। उन्‍होंने कहा कि पाकिस्‍तान भले ही अमेरिका के रेडॉर में फिर से आ गया हो लेकिन भारत से रिश्‍ता कम नहीं होने जा रहा है।



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Brazil Elections: ब्राजील में राष्ट्रपति चुनाव, बोलसोनारो और लूला डा सिल्वा के बीच होगा दूसरे दौर का मुकाबला

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Image Source : AP
Luiz Inacio Lula da Silva-Jair Bolsonaro

Highlights

  • ब्राजील में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहे
  • बोलसोनारो और सिल्वा के बीच कांटे की टक्कर
  • दोनों नेताओं के बीच होगा दूसरे दौर का मुकाबला

Brazil Elections: ब्राजील के राष्ट्रपति पद के चुनाव के प्रमुख दो उम्मीदवारों के बीच ‘रन ऑफ वोट’ (दूसरे चरण) का मुकाबला होगा, क्योंकि रविवार को हुए आम चुनाव में किसी को भी बहुमत नहीं मिल पाया है। चुनाव में दक्षिणपंथी जेयर बोलसोनारो और वामपंथी लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है। राष्ट्रपति पद के लिए 99.6 प्रतिशत मतदान हुआ है, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा को 48.3 प्रतिशत और राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो को 43.3 प्रतिशत वोट मिले। नौ अन्य उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में थे, लेकिन उनमें से किसी को भी जनता का कोई खास समर्थन नहीं मिल पाया है।

हाल में कराए गए कई चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में लूला डा सिल्वा को लोगों ने अपनी पहली पसंद बताया था। सर्वेक्षणों में हिस्सा लेने वाले 50 प्रतिशत लोगों ने लूला डा सिल्वा का समर्थन किया जबकि 36 प्रतिशत लोगों ने जेयर बोलसोनारो को एक बार फिर देश की कमान सौंपने की बात कही है। ‘फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ परनामबुको’ में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले नारा पावाओ ने कहा, ‘लूला और बोलसोनारो के बीच इतने कड़े मुकाबले की उम्मीद नहीं थी।’ मतदान के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में लूला ने बोलसोनारो के साथ 30 अक्टूबर को होने वाले ‘रन ऑफ वोट’ मुकाबले की तुलना फुटबॉल के खेल में मिलने वाला ‘अतिरिक्त समय’ से की।

पहले मुकाबले में जीतना चाहता हूं सिल्वा 

उन्होंने कहा, ‘मैं हर चुनाव पहले मुकाबले में जीतना चाहता हूं, लेकिन यह हमेशा संभव नहीं हो पाता।’ इस चुनाव के परिणाम से यह तय होगा कि दुनिया के चौथे सबसे बड़े लोकतंत्र की कमान किसके हाथ में जाएगी और देश की सत्ता चार वर्षों के लिए दक्षिणपंथी विचारधारा वाले मौजूदा राष्ट्रपति बोलसोनारो के हाथ में दोबारा जाएगी या वामपंथी लूला डा सिल्वा फिर सत्ता में लौटेंगे। 

गौरतलब है कि राष्ट्रपति बोलसोनारो पर भड़काऊ भाषण देने के अलावा लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाए जाते हैं। देश में कोविड-19 वैश्विक महामारी की चुनौती से निपटने के उनके प्रयासों की भी आलोचना हुई है। अमेजन वन क्षेत्र में बीते 15 वर्षों के दौरान पेड़ों की सबसे अधिक कटाई के लिए भी उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। हालांकि बोलसोनारो ने पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों की रक्षा करके और वामपंथी नीतियों से देश की रक्षा करने वाले नेता के रूप में खुद को पेश करके एक बड़ा जनाधार बनाया है।

ब्राजील की आर्थिक विकास दर बेहद धीमी है और कल्याणकारी योजनाएं शुरू करने के बावजूद 3.3 करोड़ लोगों को खाद्य पदार्थों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। देश में बढ़ती हुई महंगाई और बेरोजगारी भी एक बड़ी चुनौती है।

 

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यूक्रेन पर टैक्टिकल न्यूक्लियर बम गिराएंगे पुतिन? हारी बाजी को जीत में बदल देता है यह महाविनाशक हथियार

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मॉस्को:रूस और यूक्रेन का युद्ध लगातार जारी है। सात महीने से ज्यादा समय से युद्ध चल रहा है। दोनों तरफ की सेनाओं को भारी नुकसान हुआ है। हाल ही में यूक्रेन ने बड़े पैमाने पर रूस को नुकसान पहुंचाया है और कई जगहों पर वापस कब्जा जमा लिया है। ऐसे में अब रूस की ओर से टैक्टिकल न्यूक्लियर हमले का खतरा बढ़ता जा रहा है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि रूस सैनिकों की कमी से जूझ रहा है। विशेषज्ञ मान कर चल रहे हैं कि इस वजह से रूस अब छोटे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर हारी हुई बाजी को जीतने की कोशिश करेगा। रूस की पश्चिमी सीमा पर लगभग सभी इलाकों में कुल 1,588 न्यूक्लियर हथियार तैनात हैं। वहीं अगर छोटे टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों की बात करें तो उनकी सही संख्या का पता लगाना बहुत मुश्किल है।

लेकिन कई अमेरिकी खुफिया एजेंसी इनकी संख्या 1000-2000 के बीच मानती हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अगर पुतिन न्यूक्लियर हथियार इस्तेमाल करते हैं तो ये टैक्टिकल ही होंगे। लेकिन सवाल है कि आखिर ये टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार होते क्या हैं और स्ट्रैटेजिक बम से अलग कैसे हैं? एक टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार युद्ध के मैदान में इस्तेमाल करने के लिए बनाए जाते हैं। टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार 1 किलोटन से 100 किलोटन तक हो सकते हैं। समझने के लिहाज से अगर बात करें तो जापान के हिरोशिमा में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 15 किलोटन का बम फटा था।

क्यों अलग हैं टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार
अपनी घातक क्षमता के बावजूद टैक्टिकल न्यूक्लियर बम स्ट्रैटेजिक (रणनीतिक) न्यूक्लियर हथियार की तुलना में तीन तरह से अलग होते हैं। पहला कि उन्हें टार्गेट के करीब से दागा जाता है। दूसरा कि स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर बम की तुलना में इनका विस्फोट बहुत कम होता है और तीसरा इससे फैलने वाला रेडियोएक्टिव रेडिएशन बहुत सीमित होता है, जब तक वह एक न्यूट्रॉन बम न हो। लेकिन फिर भी इनसे खतरनाक नुकसान संभव है। हिरोशिमा पर गिराए गए अमेरिका के न्यूक्लियर बम के बराबर अगर टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार दागा गया तो लगभग 200 मीटर की परिधि वाला एक आग का गोला बनेगा। इस बम के फटते ही 1.6 किमी के दायरे में आने वाली हर चीज जल जाएगी।

Putin Nuclear Threat

हर चीज हो जाएगी बर्बाद
धमाके के बाद 350 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से विनाशकारी शॉकवेव निकलेगी। इसके बाद रेडियोएक्टिव कचरा आसमान से बरसेगा जो बड़े पैमाने पर हवा, मिट्टी और पानी को दूषित कर देगा। ये कुछ उसी तरह होगा जैसा 1986 में यूक्रेन के चर्नोबिल में न्यूक्लियर रिएक्टर की त्रासदी के बाद हुआ था। टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों का आकार स्ट्रैटेजिक हथियारों से कम होता है। इन्हें जेट, युद्धपोत, पनडुब्बी और क्रूज मिसाइल से फायर किया जा सकता है। इतना ही नहीं इन्हें आर्टिलरी तोप के गोले की तरह भी फायर किया जा सकता है।

tactical nuclear bomb

टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार से पुतिन को फायदा
टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार के इस्तेमाल के पीछे नुकसान को कम करना ही लक्ष्य है। क्योंकि रणनीतिक परमाणु हथियार इतने ज्यादा ताकतवर होते हैं कि वह पूरे शहर यहां तक कि पूरी सभ्यता को मिटा सकते हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति शायद ही इस तरह का कोई कदम उठाएगा। रणनीति परमाणु हथियार युद्ध खत्म करने की जगह पूरी दुनिया मरो या मारो की स्थिति पैदा कर देगी, जिससे इंसानियत का खात्मा भी हो सकता है। लेकिन अगर रूस स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर हथियार का इस्तेमाल करता है तो इससे यूक्रेन तो पीछे ही होगा, नाटो को भी इस युद्ध से दूर रहने का संदेश होगा।

क्या रूस इस्तेमाल करेगा टैक्टिकल न्यूक्लियर बम
रूस के परमाणु हथियार के इस्तेमाल को लेकर विशेषज्ञ मानते हैं कि हार की स्थिति में पुतिन कुछ भी कर सकते हैं। पुतिन अगर ऐसा करते हैं तो संभव है कि रूस पर यूक्रेन हमला तेज कर दे। लेकिन ये न्यूक्लियर हमले की तुलना में कुछ नहीं होगा। पुतिन न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल अगर करते हैं तो ये चौंकाने के साथ डराने वाला होगा। 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के रक्षा सचिव जेम्स मैटिस ने कांग्रेस को बताया था कि परमाणु हथियार चाहे जैसा हो, वह रहेगा परमाणु हथियार ही।



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