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इन्होंने बना दिया दुनिया में लंबी अवधि तक राष्ट्रपति बने रहने का विश्व रिकॉर्ड, फिर बंपर मतों से जीते

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तियोदोरो ओबियांग (इक्वेटोरियल गिनी के राष्ट्रपति)

Longest Serving President in the World: क्या आप जानते हैं कि दुनिया में सबसे लंबी अवधि तक निर्वाचित राष्ट्रपति बने रहने का रिकॉर्ड किसके पास है?…क्या आप जानते हैं कि हर बार चुनाव में एक ही शख्स आखिर किन वजहों से राष्ट्रपति के चुनाव में बार-बार जीत जाता है? …आखिर कुछ तो वजह होगी जो यह व्यक्ति हर बार चुनाव में विजय पताका फहराता आ रहा है। इस बार वर्ष 2022 के चुनाव में भी जीत हासिल कर 43 वर्षों तक लगातार राष्ट्रपति बने रहने का दुनिया का सबसे बड़ा रिकॉर्ड बना दिया है। आइए आपको बताते हैं कि यह शख्स है कौन?

अफ्रीकी देश इक्वेटोरियल गिनी का नाम आपने शायद सुना होगा। यह देश 1968 में स्पेन से आजाद हुआ था। इस देश के पहले राष्ट्रपति फ्रांसिस्को मैकियास थे। वर्ष 1979 में पहली बार तियोदोरो ओबियांग अपना चाचा फ्रांसिस्को का तख्तापलट कर सत्ता में आ गए। तब से वह लगातार राष्ट्रपति चुने जा रहे हैं। हर बार उन्हें 90 फीसदी से भी अधिक वोट मिलता है। वह करीब 43 वर्षों से इक्वेटोरियल गिनी के राष्ट्रपति हैं। इस बार के चुनाव में भी ओबियांग को 95 फीसदी मत मिले हैं।

लगातार छठवीं बार ओबियांग ने जीता चुनाव


वर्ष 2022 में ओबियांग ने लगातार छठवीं बार राष्ट्रपति का चुनाव जीता है। इक्वोटोरियल गिनी को जब से आजादी मिली है तब से अब तक केवल दो ही राष्ट्रपति हुए हैं। ओबियांग दूसरे और मौजूदा राष्ट्रपति हैं। पिछले 43 वर्षों से उनका देश पर शासन है। वह काफी सख्त मिजाज के माने जाते हैं। उनका अपने विरोधियों पर पूर्ण नियंत्रण है। उनकी अफ्रीकी देशों में भी काफी अच्छी पकड़ बताई जाती है। ओबियांग वर्ष 2011 से 2012 तक अफ्रीकी संघ के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

14 लाख है देश की आबादी

इक्वेटोरियल गिनी आबादी के लिहाज से बहुत छोटा देश है। यहां की कुल आबादी केवल 14 लाख है। बावजूद यहां के लोग गरीबी का जीवन जी रहे हैं। इस देश में लोगों की आय का कोई खास साधन नहीं है। वर्ष 1996 में यहां तेल का विशाल भंडार खोजा गया था। मगर उसका फायदा सिर्फ राजनीतिक लोगों को ही मिला। इससे उनकी आर्थिक तरक्की हुई, लेकिन जनता की हालत जस की तस है। यहां की जनता बदहाली की जिंदगी जी रही है। ओबियांग तानाशाह किस्म के बताये जाते हैं, उनका विरोध करने वालों को जेल में डाल दिया जाता है।

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Coronavirus Deer: इंसानों के साथ अब जानवरों को चपेट में ले रहा कोरोना वायरस, अमेरिका में हिरण में पाया गया

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वाशिंगटन: वैज्ञानिकों को उत्तरी अमेरिका में सफेद पूंछ वाले हिरण में सार्स-सीओवी-2 स्वरूप की मौजूदगी मिली है जो कभी मनुष्यों में व्यापक रूप से प्रसारित थे, लेकिन अब इनमें (मनुष्यों में) नहीं पाए जाते हैं। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी, अमेरिका के शोधकर्ताओं ने कहा कि हिरण में इन अप्रचलित स्वरूपों की मौजूदगी लंबे समय से है या नहीं, यह अभी अज्ञात है। हालांकि और आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं। यह अध्ययन शोध पत्रिका ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ में प्रकाशित हुआ है।

कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर डिएगो डिएल ने कहा, ‘‘इस अध्ययन के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक इस जंगली जानवरों में तीन चिंताजनक स्वरूपों-अल्फा, गामा और डेल्टा के प्रसारित होने का पता लगाना था।’’ अध्ययन में कहा गया है कि महामारी के दौरान, हिरण सार्स-सीओवी-2 से मनुष्यों के साथ संपर्क, संभवतः शिकार, वन्यजीव पुनर्वास, जंगली जानवरों को खाना देने या अपशिष्ट जल अथवा जल स्रोतों के माध्यम से संक्रमित हो गए।

वायरस के स्वरूप में हुआ बदलाव

डिएल ने कहा कि एक वायरस जो एशिया में मनुष्यों में उभरा, अब उत्तरी अमेरिका में वन्यजीवों में इसकी मौजूदगी मिली है। अध्ययन में इस्तेमाल किए गए 5,700 नमूने 2020-22 के दौरान एकत्र किए गए। जब शोधकर्ताओं ने न्यूयॉर्क में मनुष्यों से लिए गए समान स्वरूप के अनुक्रमण के साथ हिरण में पाए गए स्वरूप के जीनोमिक अनुक्रमण से तुलना की, तो उन्होंने पाया कि हिरण में वायरस के स्वरूप में बदलाव हुआ था।

कई महीनों से हिरण में था वायरस

अध्ययन के मुताबिक इससे संकेत मिलता है कि कई महीनों से हिरण में वायरस के स्वरूप की मौजूदगी थी। अध्ययन में कहा गया है कि जब तक हिरण में अल्फा और गामा स्वरूप की मौजूदगी का पता चला था, इंसानों में इन स्वरूपों का कोई साक्ष्य नहीं मिला। डिएल ने कहा, ‘‘जब हमने सफेद पूंछ वाले हिरण में मिले वायरस की तुलना इंसानों में मिले वायरस के अनुक्रमण से की तो हमने पाया कि वायरस अनुक्रमण में काफी बदलाव हुआ है।’’ उन्होंने कहा कि इंसानों में वायरस की तुलना में हिरण में पाए गए कुछ वायरस में 80 बार बदलाव हुआ।



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FBI ने फिर ली बाइडन के घर तलाशी, जानें बार-बार क्यों पड़ रहा राष्ट्रपति के घर छापा?

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जो बाइडन, अमेरिकी राष्ट्रपति

नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के घर आज बुधवार को फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआइ) ने फिर छापा मारा है। राष्ट्रपति के निजी वकील ने कहा कि एफबीआइ ने गोपनीय दस्तावेजों से संबंधित अपनी जांच के तहत बुधवार को जो.बाइडन के रेहोबोथ बीच, डेलवेयर स्थित घर की तलाशी ली। यह तलाशी 20 जनवरी को उनके विलमिंगटन, डेलवेयर आवास की 13 घंटे तक हुई छानबीन के बाद ली गई। पहले की तलाशी में राष्ट्रपति के आवास से कुछ अतिरिक्त गोपनीय दस्तावेज मिले थे। बाइडन के वकील बॉब बौएर ने कहा कि राष्ट्रपति ने जांच के तहत स्वेच्छा से न्याय विभाग को अपने आवासों की तलाशी लेने को कहा है। इसलिए बार-बार उनके घर में छापा पड़ रहा है।

बाइडन के आवास और कार्यालय से कई गोपनीय दस्तावेज मिले हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि यह उस समय के हैं जब बाइडन उपराष्ट्रपति थे। क्या आप सोच भी सकते हैं कि अमेरिका की फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन (एफबीआइ) अपने मौजूदा राष्ट्रपति के घर ही छापा मार सकती है, शायद नहीं। मगर यह सच है। एफबीआइ ने राष्ट्रपति जो.बाइडन के विलमिंग्टन स्थित आवास की तलाशी ली है। इस दौरान गोपनीय दस्तावेज के तौर पर चिह्नित छह अतिरिक्त दस्तावेज बरामद किए हैं। विभाग ने बाइडन के कुछ हस्तलिखित नोट भी अपने कब्जे में लिए हैं। राष्ट्रपति के वकील बॉब बाउर ने यह जानकारी दी। बाइडन ने एफबीआई को अपने आवास की तलाशी लेने की स्वेच्छा से अनुमति दी, लेकिन तलाशी वारंट नहीं होने के बावजूद यह घटना असाधारण है।

अब तक हुई बरामदगी

बाइडन को 12 जनवरी को यह खुलासा होने के बाद शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी कि उनके वकीलों को मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले वाशिंगटन स्थित पेन बाइडन सेंटर में उनके एक पूर्व कार्यालय से गोपनीय रिकॉर्ड मिले हैं। इसके बाद वकीलों को बाइडन के विलमिंग्टन स्थित आवास के पुस्तकालय से उपराष्ट्रपति के तौर पर उनके कार्यकाल के समय के छह और गोपनीय दस्तावेज मिले। इन दस्तावेजों का मिलना बाइडन के लिए ऐसे समय में राजनीतिक जवाबदेही बन गया है, जब वह फिर से चुनाव लड़ने के लिए अपनी दावेदारी पेश करने की तैयारी कर रहे हैं।

यह घटना पूर्ववर्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उतार-चढ़ाव भरे कार्यकाल के बाद अपने कार्यकाल को अमेरिकी जनता के सामने बेहतर दिखाने की बाइडन की कोशिश को नुकसान पहुंचाती है। बाउर ने शनिवार को बताया कि एफबीआई ने शुक्रवार को जिन दस्तावेजों को कब्जे में लिया है, वे बाइडन के सीनेटर एवं उपराष्ट्रपति के तौर पर उनके कार्यकाल से संबंधित हैं, जबकि नोट उनके उपराष्ट्रपति कार्यकाल के हैं। उन्होंने कहा कि यह तलाशी करीब 13 घंटे तक चली।

राष्ट्रपति दे चुके हैं दस्तावेजों पर सफाई


बाउर ने बताया कि अभी न्याय विभाग ने रिकॉर्ड की समीक्षा नहीं की है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इन दस्तावेजों की गोपनीयता का क्या स्तर है और क्या एफबीआई द्वारा हटाए गए दस्तावेज गोपनीय बने हुए हैं या नहीं। आम तौर पर, गोपनीय दस्तावेजों को अधिकतम 25 वर्षों के बाद सार्वजनिक किया जाता है, लेकिन कुछ रिकॉर्ड को अपेक्षाकृत अधिक समय तक गोपनीय रखा जाता है।

बाइडन ने 1973 से 2009 तक सीनेटर के तौर पर सेवाएं दी थीं। बाइडन ने बृहस्पतिवार को संवाददाताओं से कहा था, ‘‘हमने पाया कि बड़ी संख्या में दस्तावेज गलत जगह पर हैं, तो हमने उन्हें तत्काल न्याय मंत्रालय को सौंप दिया।’’ जब बाइडन के आवास की तलाशी ली गई, तो उस समय प्रथम महिला जिल बाइडन वहां नहीं थीं। वह डेलावेयर के रेहोबोथ बीच स्थित अपने आवास पर सप्ताहांत बिताने गई थीं। अभी यह देखा जाना बाकी है कि क्या अन्य स्थानों पर संघीय अधिकारी और तलाशी लेंगे या नहीं। बाइडन के निजी वकीलों ने पहले रेहोबोथ बीच आवास की तलाशी ली थी और कहा था कि उन्हें कोई आधिकारिक दस्तावेज या गोपनीय रिकॉर्ड नहीं मिला।

 

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Pakistan Peshawar Terrorism: कभी फूलों के लिए मशहूर था पेशावर, चार दशक में ऐसे बन गया आतंक का केंद्र

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पेशावर: ‘फूलों का शहर’ कहे जाने वाले पाकिस्तान के पेशावर शहर में पिछले चार दशक से हिंसा की आग बरस रही है। नाशपाती, श्रीफल और अनार के पेड़ों के बागों से घिरा शहर क्षेत्र बढ़ते उग्रवाद का खामियाजा भुगत रहा है और पड़ोसी देश अफगानिस्तान के संघर्षों और बड़ी शक्तियों के भू-राजनीतिक खेल का नुकसान उठा रहा है। पेशावर सोमवार को एक भयावह आतंकवादी हमले से उस वक्त दहल उठा था जब एक आत्मघाती हमलावर ने दोपहर की नमाज के वक्त मस्जिद में खुद को विस्फोट से उड़ा लिया।

इस हमले में कम से कम 100 लोगों की मौत हो गई और करीब 225 अन्य लोग घायल हुए हैं। इसे हालिया वर्षों में शहर में हुआ सबसे भयावह हमला माना जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि नरसंहार पाकिस्तान और अमेरिका की दशकों की त्रुटिपूर्ण नीतियों का नतीजा है। वरिष्ठ सुरक्षा विश्लेषक अब्दुल्ला खान ने कहा, ‘‘ आप जैसा बोते हैं, वैसा ही काटते हैं।’’ उन्होंने कहा कि 1980 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जियाउल हक ने रूस और अमेरिका के शीत युद्ध का हिस्सा बनने का फैसला करने तक पेशावर एक शांतिपूर्ण स्थान था।

वह पड़ोसी देश अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण के खिलाफ उसका साथ देने के लिए सामने आया पहला देश था। अफगानिस्तान की सीमा से 30 किलोमीटर दूर स्थित पेशावर ऐसा केंद्र बन गया जहां अमेरिकी सीआईए (केंद्रीय खुफिया एजेंसी) और पाकिस्तानी सेना ने सोवियत संघ से लड़ने वाले अफगानिस्तान के मुजाहिदीनों को प्रशिक्षण दिया, हथियार व वित्तीय मदद मुहैया करायी। शहर हथियारों और लड़ाकों से भर गया, जिनमें कट्टरपंथी इस्लामी उग्रवादी और लाखों अफगानिस्तानी शरणार्थी शामिल थे।

अमेरिका के जाने के बाद चुका रहे कीमत

पाकिस्तानी सेना के पूर्व ब्रिगेडियर एवं वरिष्ठ सुरक्षा विश्लेषक महमूद शाह ने कहा, ‘‘1980 के दशक में अफगानिस्तान से रूस से हटने के बाद अमेरिकियों ने मुजाहिदीन को छोड़ दिया, अमेरिकियों ने हमें भी छोड़ दिया और तब से हम इसकी कीमत चुका रहे हैं।’’ सत्ता की लड़ाई के लिए मुजाहिदीन ने अफगानिस्तान को गृह युद्ध में झोंक दिया। इस बीच पेशावर और एक अन्य पाकिस्तानी शहर क्वेटा में अफगान तालिबान ने पाकिस्तानी सरकार के समर्थन से अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। आखिरकार 1990 के दशक के अंत में तालिबान ने अफगानिस्तान में सत्ता अपने हाथ में ली, जब तक कि अमेरिका में अल-कायदा के 9/11 के हमलों के बाद 2001 में अमेरिकी नेतृत्व ने उसे खदेड़ नहीं दिया।

पेशावर हुआ हमलों का शिकार

अफगानिस्तान में तालिबान विद्रोह के खिलाफ करीब 20 वर्ष तक अमेरिकी बलों की देश में मौजूदगी तक सीमा पर और पेशावर के आसपास पाकिस्तान के कबायली क्षेत्रों में आतंकवादी संगठन फले-फूले। सरकार विरोधी संगठन पाकिस्तानी तालिबान या तहरीक-ए तालिबान-पाकिस्तानी (टीटीपी) ने 2000 दशक के अंत और 2010 की शुरुआत में देशभर में क्रूर हिंसक गतिविधियों को अंजाम दिया। पेशावर 2014 में भी एक भयावह हमले से दहला, जब सेना द्वारा संचालित एक स्कूल पर टीटीपी के हमले में करीब 150 लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर स्कूली बच्चे थे। पेशावर की भौगोलिक स्थित ने उसे मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना दिया है। एशिया के सबसे पुराने शहरों में से एक पेशावर खैबर दर्रे के प्रवेश द्वार पर स्थित है, जो दो क्षेत्रों के बीच का मुख्य मार्ग है। शाह ने कहा, ‘‘ अगर हमें पाकिस्तान में शांति चाहिए तो, हमें अफगान तालिबान की मदद से टीटीपी से बात करनी चाहिए। हिंसा से बचने का यह सबसे सही व व्यवहार्य समाधान है।



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